Tuesday, July 7, 2020

तीर्थ दर्शन की प्रस्तावित आगामी यात्रा (स्थल एवं विवरण) 

दक्ष के प्रजापति बनने के बाद ब्रह्मा ने उसे एक काम सौंपा जिसके अंतर्गत शिव और शक्ति का मिलाप करवाना था। उस समय शिव तथा शक्ति दोनों अलग थे। इसीलिये ब्रह्मा जी ने दक्ष से कहा कि वे तप करके शक्ति माता (परमा पूर्णा प्रकृति जगदम्बिका) को प्रसन्न करें तथा पुत्री रूप में प्राप्त करें। तपस्या के उपरांत माता शक्ति ने दक्ष से कहा,”मैं आपकी पुत्री के रूप में जन्म लेकर शम्भु की भार्या बनूँगी। जब आप की तपस्या का पुण्य क्षीण हो जाएगा और आपके द्वारा मेरा अनादर होगा तब मैं अपनी माया से जगत् को विमोहित करके अपने धाम चली जाऊँगी। इस प्रकार सती के रूप में शक्ति का जन्म हुआ।

प्रजापति दक्ष का भगवान् शिव से मनोमालिन्य होने के कारण रूप में तीन मत हैं। एक मत के अनुसार प्रारंभ में ब्रह्मा के पाँच सिर थे। ब्रह्मा अपने तीन सिरों से वेदपाठ करते तथा दो सिर से वेद को गालियाँ भी देते जिससे क्रोधित हो शिव ने उनका एक सिर काट दिया। ब्रह्मा दक्ष के पिता थे। अत: दक्ष क्रोधित हो गया और शिव से बदला लेने की बात करने लगा। लेकिन यह मत अन्य प्रामाणिक संदर्भों से खंडित हो जाता है। श्रीमद्भागवतमहापुराण में स्पष्ट वर्णित है कि जन्म के समय ही ब्रह्मा के चार ही सिर थे।

दूसरे मत के अनुसार शक्ति द्वारा स्वयं भविष्यवाणी रूप में दक्ष से स्वयं के भगवान शिव की पत्नी होने की बात कह दिये जाने के बावजूद दक्ष शिव को सती के अनुरूप नहीं मानते थे। इसलिए उन्होंने सती के विवाह-योग्य होने पर उनके लिए स्वयंवर का आयोजन किया तथा उसमें शिव को नहीं बुलाया। फिर भी सती ने ‘शिवाय नमः’ कहकर वरमाला पृथ्वी पर डाल दी और वहाँ प्रकट होकर भगवान् शिव ने वरमाला ग्रहण करके सती को अपनी पत्नी बनाकर कैलाश चले गये। इस प्रकार अपनी इच्छा के विरुद्ध अपनी पुत्री सती द्वारा शिव को पति चुनने के कारण दक्ष शिव को पसंद नहीं करते थे।

तीसरा मत सर्वाधिक प्रचलित है। इसके अनुसार प्रजापतियों के एक यज्ञ में दक्ष के पधारने पर सभी देवताओं ने उठकर उनका सम्मान किया, परंतु ब्रह्मा जी के साथ शिवजी भी बैठे ही रहे। शिव को अपना जामाता अर्थात् पुत्र समान होने के कारण उनके द्वारा खड़े होकर आदर नहीं दिये जाने से दक्ष ने अपना अपमान महसूस किया और उन्होंने शिव के प्रति कटूक्तियों का प्रयोग करते हुए अब से उन्हें यज्ञ में देवताओं के साथ भाग न मिलने का शाप दे दिया। इस प्रकार इन दोनों का मनोमालिन्य हो गया।

सती का आत्मदाह

उक्त घटना के बाद प्रजापति दक्ष ने अपनी राजधानी कनखल में एक विराट यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने अपने जामाता शिव और पुत्री सती को यज्ञ में आने हेतु निमंत्रित नहीं किया। शंकर जी के समझाने के बाद भी सती अपने पिता के उस यज्ञ में बिना बुलाये ही चली गयी। यज्ञस्थल में दक्ष प्रजापति ने सती और शंकर जी का घोर निरादर किया। अपमान न सह पाने के कारण सती ने तत्काल यज्ञस्थल में ही योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर दिया। सती की मृत्यु का समाचार पाकर भगवान् शंकर ने वीरभद्र को उत्पन्न कर उसके द्वारा उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। वीरभद्र ने पूर्व में भगवान् शिव का विरोध तथा उपहास करने वाले देवताओं तथा ऋषियों को यथायोग्य दण्ड देते हुए दक्ष प्रजापति का सिर भी काट डाला। बाद में ब्रह्मा जी के द्वारा प्रार्थना किये जाने पर भगवान् शंकर ने दक्ष प्रजापति को उसके सिर के बदले में बकरे का सिर प्रदान कर उसके यज्ञ को सम्पन्न करवाया

दक्ष-यज्ञ-विध्वंस : कथा-विकास के चरण

दक्ष-यज्ञ-विध्वंस की कथा के विकास के स्पष्टतः तीन चरण हैं। इस कथा के प्रथम चरण का रूप महाभारत के शांतिपर्व में है। कथा के इस प्राथमिक रूप में भी दक्ष का यज्ञ कनखल में हुआ था इसका समर्थन हो जाता है। यहाँ कनखल में यज्ञ होने का स्पष्ट उल्लेख तो नहीं है, परंतु गंगाद्वार के देश में यज्ञ होना उल्लिखित है और कनखल गंगाद्वार (हरिद्वार) के अंतर्गत ही आता है। इस कथा में दक्ष के यज्ञ का विध्वंस तो होता है परंतु सती भस्म नहीं होती है। वस्तुतः सती कैलाश पर अपने पति भगवान शंकर के पास ही रहती है और अपने पिता दक्ष द्वारा उन्हें निमंत्रण तथा यज्ञ में भाग नहीं दिये जाने पर अत्यधिक व्याकुल रहती है। उनकी व्याकुलता के कारण शिवजी अपने मुख से वीरभद्र को उत्पन्न करते हैं और वह गणों के साथ जाकर यज्ञ का विध्वंस कर डालता है। परंतु, न तो वीरभद्र दक्ष का सिर काटता है और न ही उसे भस्म करता है। स्वाभाविक है कि बकरे का सिर जोड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता है। वस्तुतः इस कथा में ‘यज्ञ’ का सिर काटने अर्थात् पूरी तरह ‘यज्ञ’ को नष्ट कर देने की बात कही गयी है, जिसे बाद की कथाओं में ‘दक्ष’ का सिर काटने से जोड़ दिया गया। इस कथा में दक्ष 1008 नामों के द्वारा शिवजी की स्तुति करता है और भगवान् शिव प्रसन्न होकर उन्हें वरदान देते हैं।

इस कथा के विकास के दूसरे चरण का रूप श्रीमद्भागवत महापुराण से लेकर शिव पुराण तक में वर्णित है। इसमें सती हठपूर्वक यज्ञ में सम्मिलित होती है तथा कुपित होकर योगाग्नि से भस्म भी हो जाती है। स्वाभाविक है कि जब सती योगाग्नि में भस्म हो जाती है तो उनकी लाश कहां से बचेगी ! {{पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चाऽपि काव्यं नवमित्यवद्यम्। सन्तः परीक्ष्यान्यतरत् भजन्ते मूढ्ः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥}}

-मालविकाग्निमित्रम् (महाकवि कालिदास)

कथा के विकास के तीसरे चरण का रूप देवीपुराण (महाभागवत) जैसे उपपुराण में वर्णित हुआ है। जिसमें सती जल जाती है और दक्ष के यज्ञ का वीरभद्र द्वारा विध्वंस भी होता है। यहाँ वीरभद्र शिवजी के तीसरे नेत्र से उत्पन्न होता है तथा दक्ष का सिर भी काटा जाता है। फिर स्तुति करने पर शिव जी प्रसन्न होते हैं और दक्ष जीवित भी होता है तथा वीरभद्र उसे बकरे का सिर जोड़ देता है। परंतु, यहाँ पुराणकार कथा को और आगे बढ़ाते हैं तथा बाद में भगवान शिव को पुनः सती की लाश सुरक्षित तथा देदीप्यमान रूप में यज्ञशाला में ही मिल जाती है। तब उस लाश को लेकर शिवजी विक्षिप्त की तरह भटकते हैं और भगवान् विष्णु क्रमशः खंड-खंड रूप में चक्र से लाश को काटते जाते हैं। इस प्रकार लाश के विभिन्न अंगों के विभिन्न स्थानों पर गिरने से 51 शक्ति पीठों का निर्माण होता है। स्पष्ट है कि कथा के इस तीसरे रूप में आने तक में सदियों या सहस्राब्दियों का समय लगा होगा।

शक्तिपीठ

इस तरह सती के शरीर का जो हिस्सा और धारण किये आभूषण जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ शक्ति पीठ अस्तित्व में आ गये। शक्तिपीठों की संख्या विभिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न बतायी गयी है। तंत्रचूड़ामणि में शक्तिपीठों की संख्या 52 बताई गयी है। देवीभागवत में 108 शक्तिपीठों का उल्लेख है, तो देवीगीता में 72 शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है। देवीपुराण में 51 शक्तिपीठों की चर्चा की गयी है। परम्परागत रूप से भी देवीभक्तों और सुधीजनों में 51 शक्तिपीठों की विशेष मान्यता है।

इतिहास

1982 तक ओल्ड पहलेजा घाट स्टेशन चालू था। 1982 में महात्मा गांधी सेतु के उद्घाटन से पहले, पटना में महेंद्रु घाट और सोनल में पहलेजा घाट के बीच भारतीय रेलवे की नियमित स्टीमर सेवा थी। पहलजा स्टेशन और सोनेपुर स्टेशन के बीच पुरानी संकीर्ण गेज लाइन थी। स्टेशन उपयोग में नहीं था और महात्मा गांधी सेतु को खोलने के बाद छोड़ दिया गया था नया स्टेशन पुराने स्टेशन से 3.2 किमी पूर्व के आसपास बनाया गया था और 3 फरवरी 2016 को शुरू हुआ था। स्टेशन पहले पहलजघाट जंक्शन नामित था, लेकिन भरपुरा के ग्रामीणों के विरोध के बाद, इसका नाम बदलकर जुलाई 2016 में भरपुरा पहलेजघाट जंक्शन कर दिया गया था। बिहार में 2016 के बाढ़ में, यह स्टेशन बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत केंद्र के रूप में काम करता था

स्टेशन आंकड़े
पता सोनपुर, सारण, बिहार-841101
Flag of India.svg भारत
निर्देशांक 25°41′49″N 85°10′2″Eनिर्देशांक: 25°41′49″N 85°10′2″E
ऊँचाई 56 मीटर (184 फीट)
लाइनें
  • Barauni–Gorakhpur, Raxaul and Jainagar lines
  • Muzaffarpur–Gorakhpur line (via Hajipur, Raxaul and Sitamarhi)
  • Barauni–Samastipur–Muzaffarpur–Hajipur line
अन्य Hajipur
संरचना प्रकार Standard (on ground station)
प्लेटफार्म 3
पटरियां 6
वाहन-स्थल Available
सामान जांच Available
अन्य जानकारियां
आरंभ 3 February 2016
विद्युतीकृत 2016
स्टेशन कूट PHLG
ज़ोन पूर्वमध्य रेलवे
मण्डल सोनपुर रेल मंडल
स्वामित्व East Central Railway of the Indian Railway
संचालक भारतीय रेल
स्टेशन स्तर Functioning
यातायात
Passengers 20,000 per day

हरिहर क्षेत्र

बिहार की राजधानी पटना से पाँच किलोमीटर उत्तर सारण में गंगा और गंडक के संगम पर स्थित ‘सोनपुर’ नामक कस्बे को ही प्राचीन काल में हरिहरक्षेत्र कहते थे। देश के चार धर्म महाक्षेत्रों में से एक हरिहरक्षेत्र है। ऋषियों और मुनियों ने इसे प्रयाग और गया से भी श्रेष्ठ तीर्थ माना है। ऐसा कहा जाता है कि इस संगम की धारा में स्नान करने से हजारों वर्ष के पाप कट जाते हैं। कर्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहाँ एक विशाल मेला लगता है जो मवेशियों के लिए एशिया का सबसे बड़ा मेला समझा जाता है। यहाँ हाथी, घोड़े, गाय, बैल एवं चिड़ियों आदि के अतिरिक्त सभी प्रकार के आधुनिक सामान, कंबल दरियाँ, नाना प्रकार के खिलौने और लकड़ी के सामान बिकने को आते हैं। सोनपुर मेला लगभग एक मास तक चलता है। इस मेले के संबंध में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं।

हरिहरनाथ मंदिर

 

हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इंद्रद्युम्न नामक एक राजा ,अगस्त्य मुनि के शाप से हाथी बन गए थे और हुहु नामक गंधर्व देवल मुनि के शाप से मगरमच्छ। कालांतरण में गज(हाथी) और मगरमच्छ के बीच सोनपुर में गंगा और गंडक के संगम पर युद्ध हुआ था. इसी के पास कोनहराघाट में पौराणिक कथा के अनुसार गज और ग्राह(मगरमच्छ) का वर्षों चलनेवाला युद्ध हुआ था। बाद में भगवान विष्णु की सहायता से गज की विजय हुई थी। एक अन्य किंवदंती के अनुसार जय और विजय दो भाई थे। जय शिव के तथा विजय विष्णु के भक्त थे। इन दोनों में झगड़ा हो गया था। तथा दोनों गज और ग्राह बन गए। बाद में दोनों में मित्रता हो गई वहाँ शिव और विष्णु दोनों के मंदिर साथ साथ बने जिससे इसका नाम हरिहरक्षेत्र पड़ा। कुछ लोगों के अनुसार प्राचीन काल में यहाँ ऋषियों और साधुओं का एक विशाल सम्मेलन हुआ तथा शैव और वैष्णव के बीच गंभीर वादविवाद खड़ा हो किंतु बाद में दोनों में सुलह हो गई और शिव तथा विष्णु दोनों की मूर्तियों की एक ही मंदिर में स्थापना की गई, उसी को स्मृति में यहाँ कार्तिक में पूर्णिमा के अवसर पर मेला आयोजित किया जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार धनुष यज्ञ में अयोध्या से बक्सर होते हुए जनकपुर जाते वक्त भगवान राम ने गंगा एवं गंडक नदी के तट पर अपने अाराध्य भगवान शंकर की मंदिर की स्थापना की थी तथा इस मंदिर में पूजा अर्चना के बाद सीता स्वयंवर में शिव के धनूष को तोड़कर सीता जी का वरन किया था।

बाबा हरिहरनाथ पुस्तक के लेखक उदय प्रताप सिंह के अनुसार 1757 के पहले हरिहरनाथ मंदिर इमारती लकडिय़ों और काले पत्थरों के कलात्मक शिला खंडों से बना था। इनपर हरि और हर के चित्र और स्तुतियां उकेरी गई थीं। उस दरम्यान इस मंदिर का पुनर्निर्माण मीर कासिम के नायब सूबेदार राजा रामनारायण सिंह ने कराया था। वह नयागांव, सारण (बिहार) के रहने वाले थे। इसके बाद 1860 में में टेकारी की महारानी ने मंदिर परिसर में एक धर्मशाला का निर्माण कराया। 1871 में मंदिर परिसर की शेष तीन ओसारे का निर्माण नेपाल के महाराणा जंगबहादुर ने कराया था। 1934 के भूकंप में मंदिर परिसर का भवन, ओसारा तथा परकोटा क्षतिग्रस्त हो गया। इसके बाद बिड़ला परिवार ने इसका पुनर्निर्माण कराया। अंग्रेजी लेखक हैरी एबोट ने हरिहर नाथ मंदिर का भ्रमण कर अपनी डायरी में इसके महत्व पर प्रकाश डाला था। 1871 में अंग्रेज लेखक मिंडेन विल्सन ने सोनपुर मेले का वर्णन अपनी डायरी में किया है।

संगम किनारे स्थित दक्षिणेश्वर काली की मूर्ति में शुंग काल का स्तंभ है। कुछ मूर्तियां तो गुप्त और पाल काल की भी हैं।

जड़भरत का प्रकृत नाम ‘भरत’ है, जो पूर्वजन्म में स्वायंभुव वंशी ऋषभदेव के पुत्र थे। मृग के छौने में तन्मय हो जाने के कारण इनका ज्ञान अवरुद्ध हो गया था और वे जड़वत् हो गए थे जिससे ये जड़भरत कहलाए। जड़भरत की कथा विष्णुपुराण के द्वितीय भाग में और भागवत पुराण के पंचम काण्ड में आती है। इसके अलावा यह जड़भरत की कथा आदिपुराण नामक जैन ग्रन्थ में भी आती है।

शालग्राम तीर्थ में तप करते समय इन्होंने सद्य: जात मृगशावक की रक्षा की थी। उस मृगशावक की चिंता करते हुए इनकी मृत्यु हुई थी, जिसके कारण दूसरे जन्म में जंबूमार्ग तीर्थ में एक “जातिस्मर मृग” के रूप इनका जन्म हुआ था। बाद में पुन: जातिस्मर ब्राह्मण के रूप में इनका जन्म हुआ। आसक्ति के कारण ही जन्मदु:ख होते हैं, ऐसा समझकर ये आसक्तिनाश के लिए जड़वत् रहते थे। इनको सौवीरराज की डोली ढोनी पड़ी थी पर सौवीरराज को इनसे ही आत्मतत्वज्ञान मिला था।

 

कौन हारा घाट गंगा – गंडक नदियों के प्रमुख घाटों में से एक है जहाँ सदियों से कई हिंदू अनुष्ठानों के लिए और अंतिम संस्कार के लिए आते हैं। इस घाट का नाम एक प्राचीन कथा पर पड़ा है जिसके अनुसार जब गज (हाथी) और ग्राह (मगरमच्छ) के बीच एक लड़ाई हुई जिसमें अपने भक्त गजराज को बचाने के लिए भगवान विष्णु को मध्यस्थता करनी पड़ी।

इस कहानी की विशाल सांस्कृतिक प्रासंगिकता है तथा इसकी अभिव्यक्ति हाजीपुर स्टेशन के गुंबद और अन्य प्रमुख स्थानों पर दिखाई देती है। वास्तव में इस स्थान का नाम “कौन हारा” इसी पारंपरिक कहानी के नाम पर पड़ा है।

 

भारतीय समाज में अनादि काल से सामाजिक प्रकाश स्तंभ की भांति मंदिरों का अस्तित्व विद्यमान रहा है। बिहार के हाजीपुर में कौनहारा घाट पर बना नेपाली मंदिर काष्ठ कला का अदभूत नमूना है। पटना-मुजफ्फरपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर गांधी सेतु पुल पार कर जडुआ मोड़ से छः किमी दूरी तय करके इस स्थान तक आया जा सकता है।

मंदिर परिसर में काठ यानी लकड़ी की मूर्तियां बनी हैं। ये मूर्तियां काम कला के अलग-अलग आसन प्रदर्शित कर रही हैं। ऐसी मूर्तियों के बारे में आपने खजुराहो और अजंता, एलोरा में सुनी होंगी पर बिहार में अपनी तरह का ये अनूठा मंदिर है। जहां मूर्तियों के माध्यम से यौन शिक्षा के प्रति जागरूक करने की कोशिश की गई है।

मंदिर का निर्माण नेपाल के पैगोडा शैली में हुआ है। मंदिर का निर्माण 18वीं सदी में हुआ। इस मंदिर को नेपाली सेना के कमांडर मातबर सिंह थापा ने बनवाया। इसलिए इसे नेपाली छावनी मंदिर भी कहते हैं।

नेपाली मंदिर मूल रूप से भोलेनाथ यानी शिव का मंदिर है। गंगा और गंडक नदी के संगम पर बना ये मंदिर अपनी वास्तुकला के लिए जाना जाता है। मंदिर के निर्माण में लकड़ी का प्रयोग बड़ी मात्रा में हुआ है। मुख्य मंदिर के बाहर गुंबद के नीचे लकड़ी के शहतीर लगे हैं। इन शहतीरों पर उकेरी गई हैं अलग अलग भंगिमाओं में मूर्तियां। मुख्य मंदिर के चारों तरफ चौबारे बने हैं।

कला साहित्य के पारखी लोग नेपाली मंदिर को देखने दूर दूर से आते हैं। लेकिन हाजीपुर के लोगों इस मंदिर से अनजान है। मंदिर में पूजा पाठ को लेकर लोग ज्यादा जागरूक नहीं दिखाई देते। हालांकि नेपाली मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित इमारतों की सूची में शामिल है, लेकिन मंदिर के आसपास निर्माण हो चुका है।

यहां नारायणी गंडक के किनारे की दृश्यावली बड़ी ही मनभावन है, जहां एक तरफ महाश्मशान में चिता अहर्निश जलती रहती है और इसी के बगल में है नारायणी नदी घाट। इसके आगे एक विशाल कक्ष के बीचों-बीच नेपाली मंदिर विराजमान है जिसके बाह्य ऊपरी भाग व शिखर नेपाल के विश्वविख्यात पशुपतिनाथ मंदिर का एकदम साम्य रूप है।

मूलतः लकड़ी के बने इस देवालय की शिल्पकृति देवालयों से भिन्न व बिल्कुल अलग है। मंदिर के पुजारी कहते हैं कि तकरीबन 550 वर्ष पूर्व राना ने अपने साम्राज्य विस्तार व अधीनस्थ राजाओं पर विजय प्राप्ति के उपलक्ष्य में इस मंदिर का निर्माण समाज में काम विद्या के लोक शिक्षण हेतु करवाया।

काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना के निदेशक डॉ. विजय कुमार चौधरी का मानना है कि बिहार प्रदेश के उत्तर मुगलकालीन देवालय में नेपाली मंदिर अपनी बनावट व युग्म मूर्तियों के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है।

ऐसे तो यहां सालों भर देशी-विदेशी पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है पर प्रत्येक वर्ष पूरे श्रावण व कार्तिक माह में यहां भक्तों के आगमन से विशाल मेला लग जाता है।
कुल मिलाकर बिहार प्रदेश का यह मंदिर अपने अनूठे बनावट व शिल्पकृति के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है, जहां के दर्शन की स्मृति वर्षों जीवंत बनी रहती है।

 

बिहार में प्रभु श्री राम के कई सारे मंदिर है। उन सभी मंदिरों में हाजीपुर का  रामचौरा मंदिर भी शामिल है। इस मंदिर के बारे में यहातक भी कहा जाता है की इसका निर्माण रामायण के समय में करवाया गया था। और सबसे खास बात यह की भगवान श्री राम जब इस जगह पर आये थे उसके बाद ही इस स्थान पर प्रभु श्री राम का मंदिर बनवाया गया था।

ऐसा कहा जाता है की श्री रामचंद्र यहाँ पर शिक्षा ग्रहण करने के लिए आये थे और उसके लिए उन्होंने मुंडन भी करवाया था।

प्रसिद्ध रामचौरा मंदिर बिहार के हाजीपुर शहर मे स्थित है। इस मंदिर के नाम से यह अनुमान लगाया जा सकता हैं की यह मंदिर किस भगवान को समर्पित होंगा।

यहाँ की एक कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है की जब भगवान श्री राम जनकपुर जा रहे थे तो उस उक्त श्री राम इस मंदिर की जगह पर ठहरे थे और उन्होंने इसी स्थान पर मुंडन किया था। और इसी कारण ही इस मंदिर में भगवान श्री राम के चरणों की पूजा की जाती है। इसी कारण हिन्दू धर्म में इस मंदिर को काफी महत्व दिया गया है।

यहापर हर साल बड़े उल्हास से राम नवमी मनाई जाती है। राम नवमी के त्यौहार पर यह एक छोटीसी यात्रा का भी आयोजन किया जाता है।

इस दिन को भगवान श्री राम का अयोध्या के राजा दशरथ और कौसल्या के यहाँ जन्म हुआ था।

भगवान श्री राम दशावतार विष्णु का सातवा अवतार माना जाता है। भगवान श्री राम की नवमी चैत्र महीने में शुक्ल पक्ष में नौवे दिन पर मनाई जाती है। इसी वजह से भी इस त्यौहार को चैत्र मास सुक्ल पक्ष नवमी भी कहा जाता है।

रामचौरा में खुदाई के दौरान जितने भी चीजे मिली उन सभी को पटना के संग्रहालय में रखा गया है।

रामचौरा मंदिर तक कैसे पहुचे? – How to Reach Ramchaura Mandir

सड़क से: रामचौरा मंदिर में आने के लिए बस की सुविधा उपलब्ध है। हाजीपुर शहर में आने के लिए पटना, कुमार बाजितपुर, समस्तीपुर, छपरा और मुजफ्फरपुर से बस की व्यवस्था की गयी है।

रेल से: हाजीपुर रेल जंक्शन जो पूर्व मध्य रेल का मुख्यालय है।

हवाई जहाज से: लोकनायक जयप्रकाश नारायण हवाई अड्डा हाजीपुर से केवल 21 किमी की दुरी पर है।

प्रभु श्री राम की बहुत सारे मंदिरे हमें जमीन पर ही देखने को मिलते है। कुछ ऐसी ही मंदिरे बिहार राज्य में भी है। मगर जिस रामचौरा मंदिर की बात यहापर की जा रही है, उसकी बात अन्य मंदिरों से भिन्न है। प्रभु श्री राम के इस जागृत मंदिर की बात ही कुछ अलग है।

रामचौरा का यह मंदिर जमीन से 45 मीटर की उचाई पर है। इसकी उचाई के कारण मंदिर की सुन्दरता में बढ़ोतरी हुई है। कोई भी भक्त दूर से ही इस मंदिर को पहचान सकता है।

इस मंदिर में आकर भगवान के दर्शन लेने का अनुभव ही सबसे अलग माना जाता है। यहापर आने के बाद भक्त को एक अलग तरह की शांति का अहसास होता है।

यह स्थान ज्येष्ठ शुक्लपक्ष दशहरा से सावन तक प्रत्येक सोमवार और शुक्रवार को महिला श्रद्धालुओं के आगमन से गुलजार रहता है। यहां 95 फीसदी महिलाएं पूजन के लिए आती है। जिस घर में शादी-विवाह होता है, वहां की महिलाएं तो अवश्य बुढि़या माई पूजन के लिए आती है। मान-मनौती और मुंडन आदि संस्कार भी होते हैं। महिलाओं का मानना है कि बुढि़या माई की कृपा से ही घर परिवार सुखी-संपन्न होता है। सैकड़ों दुकानें सजी है।

 

वैशाली यानि राजा विशाल की गढ़ी। ये वो जगह है जहां ज्ञान, समता और संस्कार की नदियां बहती थीं। भगवान बुद्ध को ये जगह काफी पसंद थी। वो अपने जीवन काल में कई बार यहां आए थे। लेकिन इसकी सबसे बड़ी विश्षता ये है कि इसने पूरी दुनिया को गणतंत्र का पाठ उस वक्त पढ़ाया जब पूरब से पश्चिम तक के लोगों को इसके बारे में पता नहीं था। वैशाली बिहार प्रान्त के वैशाली जिला में स्थित एक गांव है। ऐतिहासिक स्थल के रूप में प्रसिद्ध ये गांव मुजफ्फरपुर से अलग होकर 12 अक्टूबर 1972 को वैशाली के जिला बनने पर इसका मुख्यालय हाजीपुर बनाया गया। बज्जिका और हिन्दी यहां की मुख्य बोली है। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार वैशाली में ही विश्व का सबसे पहला गणतंत्र यानि “रिपब्लिक” कायम किया गया था। भगवान महावीर की जन्म स्थली होने के कारण जैन धर्म के मतावलम्बियों के लिए वैशाली एक पवित्र स्थल है। भगवान बुद्ध का इस धरती पर तीन बार आगमन हुआ। ये उनकी कर्मभूमि भी थी। महात्मा बुद्ध के समय सोलह महाजनपदों में वैशाली का स्थान मगध के समान महत्त्वपूर्ण था। अतिमहत्त्वपूर्ण बौद्ध और जैनस्थल होने के अलावा ये जगह पौराणिक हिन्दू तीर्थ और पाटलिपुत्र जैसे ऐतिहासिक स्थल के निकट है।

मशहूर राजनर्तकी और नगरवधू आम्रपाली भी यहीं की थी| आज वैशाली में देश-विदेश से लोग घूमने आते हैं। वैशाली में आज दूसरे देशों के कई मंदिर भी बने हुए हैं। वैशाली का नामाकरण महाभारत काल एक राजा ईक्ष्वाकुवंशीय राजा विशाल के नाम पर हुआ है। विष्णु पुराण में इस क्षेत्र पर राज करने वाले 34 राजाओं का जिक्र है। जिसमें प्रथम नमनदेष्टि और अंतिम सुमति या प्रमाति थे। इस राजवंश में 24 राजा हुए। राजा सुमति अयोध्या नरेश भगवान राम के पिता राजा दशरथ के समकालीन थे।

ईसा पूर्व सातवीं सदी के उत्तरी और मध्य भारत में विकसित हुए 16 महाजनपदों में वैशाली का स्थान अति महत्त्वपूर्ण था। नेपाल की तराई से लेकर गंगा के बीच फैली जमीन पर बज्जियों और लिच्छेवियों के संघ (अष्टकुल) द्वारा गणतांत्रिक शासन व्यवस्था की शुरूआत की गई थी। लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व में यहां का शासक जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाने लगा और गणतंत्र की स्थापना हुई। दुनिया को सबसे पहले गणतंत्र का ज्ञान करानेवाला स्था न वैशाली ही है। प्राचीन वैशाली नगर अति समृद्ध और सुरक्षित नगर था जो एक-दूसरे से कुछ अन्तर पर बनी हुई तीन दीवारों से घिरा था। प्राचीन ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि नगर की किलेबन्दी यथासम्भव इन तीनों कोटि की दीवारों से की जाए। ताकि शत्रु के लिए नगर के भीतर पहुंचना असम्भव हो सके। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार पूरे नगर का घेरा 14 मील के लगभग था। मौर्य और गुप्तस राजवंश में जब पाटलीपुत्र (आधुनिक पटना) राजधानी के रूप में विकसित हुआ, तब वैशाली इस क्षेत्र में होने वाले व्यारपार और उद्योग का प्रमुख केन्द्र था। भगवान बुद्ध ने वैशाली के समीप कोल्हुेआ में अपना अन्तिम सम्बोधन दिया था।

इसकी याद में महान मौर्य सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व सिंह स्तगम्भ का निर्माण करवाया था। महात्माक बुद्ध के महापरिनिर्वाण के लगभग 100 साल बाद वैशाली में दूसरे बौद्ध परिषद् का आयोजन किया गया था। इस आयोजन की याद में दो बौद्ध स्तूप बनवाये गये। वैशाली के समीप ही एक विशाल बौद्ध मठ है, जिसमें महात्मा बुद्ध उपदेश दिया करते थे। भगवान बुद्ध के सबसे प्रिय शिष्य आनंद की पवित्र अस्थियाँ हाजीपुर (पुराना नाम – उच्चकला) के पास एक स्तूप में रखी गयी थी। वैशाली, यहाँ की नगरवधू आम्रपाली का जन्म स्थान भी है। वैशाली को चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के जन्म स्थल का गौरव भी प्राप्त है। जैन धर्मावलम्बियों के लिए वैशाली काफी महत्त्वेपूर्ण है। यहीं पर 599 ईसा पूर्व में जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्मत कुंडलपुर (कुंडग्राम) में हुआ था। बज्जिकुल में जन्मे भगवान महावीर यहां 22 साल की उम्र तक रहे थे। इस तरह वैशाली हिन्दू धर्म के साथ-साथ भारत के दो अन्य महत्त्वपूर्ण धर्मों का केन्द्र था। बौद्ध और जैन धर्मों के अनुयायियों के अलावा ऐतिहासिक पर्यटन में दिलचस्पीह रखने वाले लोगों के लिए भी वैशाली महत्त्वपूर्ण है।

वैशाली की धरती न केवल ऐतिहासिक रूप से समृद्ध है वरन् कला और संस्कृीति के दृष्टिकोण से भी काफी धनी है। वैशाली जिला के चेचर (श्वेतपुर) से प्राप्त मूर्तियां और सिक्के पुरातात्विक महत्त्व के हैं। पूर्वी भारत में मुस्लिम शासकों के आगमन के पूर्व वैशाली मिथिला के कर्नाट वंश के शासकों के अधीन रहा लेकिन जल्द ही यहां बख्तियार खिलजी का शासन हो गया। तुर्क-अफगान काल में बंगाल के एक शासक हाजी इलियास शाह ने 1345 ई॰ से 1358 ई॰ तक यहां शासन किया। बाबर ने भी अपने बंगाल अभियान के दौरान गंडक तट के पार अपनी सैन्य टुकड़ी को भेजा था। 1572 ई॰ से 1574 ई॰ के दौरान बंगाल विद्रोह को कुचलने के क्रम में अकबर की सेना ने दो बार हाजीपुर किले पर घेरा डाला था। 18वीं सदी के दौरान अफगानों द्वारा तिरहुत कहलानेवाले इस प्रदेश पर कब्जा किया। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय वैशाली के शहीदों की अग्रणी भूमिका रही है। बसावन सिंह, बेचन शर्मा, अक्षयवट राय, सीताराम सिंह, बैकण्ठ शुक्ला, योगेन्द्र शुक्ला जैसे मुनीश्वर प्रसाद सिंह जैसे सेनानियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई में महत्त्वपूर्ण हिस्सा लिया।

आजादी की लड़ाई के दौरान 1920, 1925 और 1934 में महात्मा गांधी का वैशाली में आगमन हुआ था। आचार्य चतुरसेन ने वैशाली की नगरवधू पर एक रचना लिखी थी जिसका फिल्मांतरण भी हुआ, जिसमें अजातशत्रु की भूमिका अभिनेता सुनील दत्त द्वारा निभायी गयी है। सम्राट अशोक ने वैशाली में हुए महात्मा बुद्ध के अन्तिम उपदेश की याद में नगर के समीप सिंह स्तशम्भ की स्थाएपना की थी। पर्यटकों के बीच यह स्थायन लोकप्रिय है। दर्शनीय मुख्य परिसर से लगभग 3 किलोमीटर दूर कोल्हुआ यानी बखरा गांव में हुई खुदाई के बाद निकले अवशेषों को पुरातत्व विभाग ने चारदीवारी बनाकर सहेज रखा है।

परिसर में प्रवेश करते ही खुदाई में मिला ईंटों से निर्मित गोलाकार स्तूप और अशोक स्तम्भ दिखायी दे जाता है। एकाश्म स्ताम्भ का निर्माण लाल बलुआ पत्थतर से हुआ है। इस स्तमम्भ के ऊपर घण्टी के आकार की बनावट है (लगभग 18.3 मीटर ऊंची) जो इसको और आकर्षक बनाता है। अशोक स्तम्भ को स्थानीय लोग इसे भीमसेन की लाठी कहकर पुकारते हैं। यहीं पर एक छोटा-सा कुण्ड है, जिसको रामकुण्ड के नाम से जाना जाता है। पुरातत्व विभाग ने इस कुण्ड की पहचान मर्कक-हद के रूप में की है। कुण्ड के एक ओर बुद्ध का मुख्य स्तूप है और दूसरी ओर कुटागारशाला है। सम्भवत: कभी ये भिक्षुणियों का प्रवास स्थल रहा है। दूसरे बौद्ध परिषद् की याद में यहां पर दो बौद्ध स्तूदपों का निर्माण किया गया था। इन स्तूैपों का पता साल 1958 की खुदाई के बाद चला। भगवान बुद्ध के राख पाये जाने से इस स्थाान का महत्त्वौ काफी बढ़ गया है। ये स्थान बौद्ध अनुयायियों के लिए काफी महत्त्वथपूर्ण है। बुद्ध के पार्थिव अवशेष पर बने आठ मौलिक स्तूपों में से एक है। बौद्ध मान्यता के अनुसार भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात कुशीनगर के मल्ल शासकों प्रमुखत: राजा श्री सस्तिपाल मल्ल जो कि भगवान बुद्ध के रिश्तेदार भी थे के द्वारा उनके शरीर का राजकीय सम्मान के साथ अन्तिम संस्कार किया गया और अस्थि अवशेष को आठ भागों में बांटा गया।

जिसमें से एक भाग वैशाली के लिच्छवियों को भी मिला था। शेष सात भाग मगध नरेश अजातशत्रु, कपिलवस्तु के शाक्य, अलकप्प के बुली, रामग्राम के कोलिय, बेटद्वीप के एक ब्राह्मण, पावा और कुशीनगर के मल्लों को प्राप्त हुए थे। मूलत: ये पांचवी शती ई॰ पूर्व में निर्मित 8.07 मीटर व्यास वाला मिट्टी का एक छोटा स्तूप था। मौर्य, शुंग और कुषाण कालों में पकी ईंटों से आच्छादित करके चार चरणों में इसका परिवर्तन किया गया, जिससे स्तूप का व्यास बढ़कर लगभग 12 मीटर हो गया। प्राचीन वैशाली गणराज्य द्वारा ढाई हजार साल पहले बनवाया गया पवित्र सरोवर है। ऐसा माना जाता है कि इस गणराज्यई में जब कोई नया शासक निर्वाचित होता था तो उनको यहीं पर अभिषेक करवाया जाता था। इसके पवित्र जल से नहाने के बाद ही लिच्छिवियों का अराजक गणतांत्रिक संथागार में बैठता था। राहुल सांकृत्यायन ने अपने उपन्यास “सिंह सेनापति” में इसका उल्लेख किया है।अभिषेक पुष्करणी के नजदीक ही जापान के निप्पोनजी बौद्ध समुदाय द्वारा बनवाया गया विश्वि शान्ति स्तूजप स्थित है।

 

विश्व के सबसे ऊँचे बौद्ध स्तूप आज कल बौद्ध धर्मावलम्बियों व आम लोगों के लिए पर्यटक केन्द्र के साथ-साथ आस्था का केन्द्र बना हुआ है। बिहार की राजधानी पटना से करीब 110 किलोमीटर की दूरी पर पूर्वी चम्पारण जिले के केसरिया वैशाली मार्ग के केसरिया में स्थित है। वर्ष 2001 में भारतीय पुरातत्व सवेक्षण पटना अंचल के पुरातात्विक मो. के के साहब ने पूर्व से प्रचलित देउरा या राजा वेन के गढ़ के रूप में प्रसिद्ध टीले को विश्व का सबसे उंचा बौद्ध स्तूप घोषित किया था।

विश्व प्रसिद्ध स्तूप के रूप में घोषित होते ही केसरिया विश्व मानचित्र पर एकाएक छा गया। ऐसी मान्यता है कि गौतम बुद्ध के जीवन की कई महत्वपूर्ण घटनाएं केसरिया में घटी। केसरिया (के सपूत निगम) में ही उन्होंने राजसी वस्त्र का त्याग किया। इसी धरती पर ज्ञान की खोज के क्रम में अलार-कलाम नामक सन्यासी से गौतम बुद्ध ने प्रथम शिक्षा ली थी। यहीं से वैशाली होकर वे बोधगया पहुंचे जहां उन्हें बोधिवृक्ष के नीचे मूल ज्ञान की प्राप्ति हुई।

जीवन के गौतम बुद्ध कुशीनगर के प्रस्थान कर रहे थे तो रात्रि विश्राम उन्होंने केसरिया में किया गया था। उनके साथ वैषाली से भारी संख्या में अनुयायी आये थे जिन्हे भिक्षा पात्र देकर उन्होंने केसरिया से वैशाली के लिए विदा किया था। तत्पश्चात वे कुशीनगर के लिए चले गये थे। बहुत सारी ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़े होने के कारण ही इस महा स्थान केसरिया में अजादशत्रु ने विश्व का सबसे उंचा बौद्ध स्तूप बनवाया।

चीनी यात्री हवेनसाग एवं हाफियान भी केसरिया आये थे और अपने यात्रा कृतान्त में इस स्तूप की चर्चा की। जेनरल कनिधम होडसन एवं मैकेनजी ने भी स्तूप का भ्रमण कर अपनी रिपोर्ट दी। वर्ष 1861-62 में कनिधम ने कहा था कि केसरिया स्तूप के निर्माण में दस से पन्द्रह करोड़ ईंट लगी थी। साथ ही इसकी उंचाई लगभग 150 फीट थी। सन 1934 के भूकम्प में इस स्तूप को काफी क्षति पहुंची थी। 3 मार्च 1998 को इस स्तूप की प्रथम खुदाई आरम्भ की गयी। वर्ष 2001 में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण पटना अंचल के पुरातात्विक मो.के के साहब ने इस दुनिया का सबसे उंचा स्तूप घोषित किया था।

विश्व प्रसिद्ध केसरिया बौद्ध स्तूप की उंचाई वर्तमान 104 फीट 10 ईंच है। यह करीब 30 एकड़ भूभाग पर फैला हुआ है। वर्ष 1998 से लेकर अब तक स्तूप के करीब चालीस प्रतिशत भाग पर ही उत्खनन का कार्य हो पाया है। हालांकि उत्खनन के परिमाण में संरक्षण का कार्य नहीं हो रहा है। उत्खनन के बाद जो मूल स्वरूप बाहर आये हैं। उन्हें बारिस में भारी क्षति पहुंच रही है। इस स्तूप का आधे से अधिक हिस्से की खुदाई अभी तक बाकी है। केसरिया स्तूप विश्व प्रसिद्ध होते ही यहां देशी-विदेशी पर्यटकों के आने का सिलसिला शुरू हो गया है। नेपाल चीन, तिब्बत, जापान, कोरिया, थाईलैण्ड, भुटान, श्रीलंका समेत कई अन्य देशों से हजारों की संख्या में पर्यटक यहां प्रतिवर्ष आते रहते है। मगर सरकारी स्तर पर सुविधा भी नदारद है।

पर्यटकों के लिए रहने खाने की सुविधा की बात कौन कहे यहां एक शौचालय एवं शुद्ध पेयजल भी उपलब्ध नहीं है। राज्य सरकार ने पर्यटक भवन 50 लाख की लागत से बनाया जरूर मगर स्तूप से काफी दूर प्रखण्ड कार्यालय परिसर में जहां पर्यटक नहीं पहुंच पाते है। विश्व प्रसिद्ध यह स्तूप आज उपेक्षा का शिकार बन कर रह गया है। इस स्तूप के विकास को लेकर केन्द्र व राज्य सरकार दोनों को इसकी चिन्ता है। अब तक विकास में चाहरदिवारी का निर्माण व पांच सोलर लाइट लगे हुए है जिसमें सब बन्द के बराबर है। केसरिया में आयोजित सरकारी महोत्सव में राज्य सरकार के मंत्री महोदय विकास के लिए बड़ी-बड़ी घोषणा जरूर करते हंै। मगर उन घोषणाओं पर अमल नहीं होता है।

महाशिवरात्रि के अवसर पर शिवनगर सतपिपरा महादेव की छटा निराली हो जाती है।इस अवसर पर यहां दूर – दूर के लोग आकर शिवलिंग पर जलाभिषेेेक कर मनोरथ पूरा करते हैं। सैकड़ों वर्ष पुराने इस शिवालय को सजाने व साफ -सफाई को लेकर स्थानीय लोग शिवरात्रि के पहले से ही जुट जाते हैं। वैसे प्रखंड क्षेत्र के सबसे पुरातन इस शिव मंदिर में पूजा अर्चना तो प्रतिदिन होती है। परंतु शिवरात्रि के अवसर पर यहां का रौनक ही बदल जाता है। प्रखंड के लोगों के साथ ही पूरे जिले से लोगों का आना होता है।यहां प्रसिद्ध मेला का आयोजन भी सैकड़ों वर्ष से हो रहा है। यह मेला मिट्टी के पात्रों के लिए प्रसिद्ध है। शिवरात्रि के अवसर पर यहां लगने वाले मेले से जिले के सुदूरवर्ती लोग भी आचार रखने वाले मिट्टी के कलात्मक बर्तन खरीदने पंहुचते हैं। यहां कलात्मक रचना के मिट्टी के घड़ों को देख लोग आश्चर्य चकित हो जाते हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर लगने वाले मेले का इतिहास भी प्राचीन है। किवदंतियों के मुताबिक यहां मेला का आयोजन और मंदिर के निर्माण की बात का जुड़ाव लोग भगवान राम से मानते हैं।

पश्चिम चंपारण का मुख्यालय बेतिया भारतवर्ष के प्राचीनतम इतिहास का धरोहर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। बेतिया का इतिहास मुगल साम्राज्य के शाहजहां के दौर से शुरू होता है। हमारे शहर बेतिया में सदियों पुरानी ऐतिहासिक धरोहर मौजूद है, ऐतिहासिक धरोहरों में हमारा शहर काफी धनी थे। शाहजहां के दौर में बताया जाता है कि शाहजहां के तहसीलदारों में बेतिया राज के पहले राजा भी थे।  शाहजहां ने पश्चिम चंपारण  बेतिया राजा को तहसील में दिया था। बेतिया के ऐतिहासिक धरोहर में प्राचीनतम इतिहास हमारे काली बाग मंदिर का है, जो करीब 300 साल से भी ज्यादा पुराना है।  इस संदर्भ में हमारे खोज के अनुसार 1617 ईस्वी का समय था कि राजा दिलीप सिंह ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। बेतिया में सागर पोखरा, संतघाट मंदिर, काली बाग मंदिर, बेतिया राज दरबार से कुछ दूरी पर स्थित है। इसके बारे में यह प्रमुख बातें सामने आती है कि राज महल से रानी जमीन के अंदर सुरंग के रास्ते से काली बाग मंदिर में पूजा करने जाया करती थीं। काली बाग मंदिर का मेन गेट उत्तर की ओर खुलता है। इससे अंदर जाने पर दाहिने और बाएं ओर  पहले दो कमरों में द्वारपालों की मूर्तियां हैं, दाएं हाथ पश्चिम की ओर बढ़ने पर मंदिर की चौहद्दी में, दक्षिणेश्वर काली (जिनका मुँह दक्षिण की ओर है) की भव्य मंदिर है, दक्षिण की ओर भगवान शिव हैं तो पूरब में सूरज सूर्य नवग्रह का मंदिर पश्चिम दिशा में विष्णु दशावतार के मंदिर तथा पश्चिम दक्षिण के कोने पर विनायक गणेश की एक मूर्ति है जिसमें 108 छोटी मूर्तियां ,इस मंदिर में दक्षिण की ओर कोने में भगवान कार्तिकेय की एक मंदिर है, इन मंदिरों के बीचो बीच एक शानदार पोखरा है जिसके बारे में बताया जाता है कि इसके अंदर सात कुँए हैं। इस मंदिर के नीचे से जमीन के अंदर वह रास्ता भी है जहां से राज महल तक आप पहुंच सकते हैं जो वर्षों से बंद पड़ा है इसी रास्ते से बेतिया महाराज की रानी काली मंदिर में पूजा के लिए आया करती थीं।कहा जाता है कि  इस तरह का मंदिर एशिया में सिर्फ दो ही जगह है एक कोलकाता में और  दूसरा हमारे बेतिया शहर में जिसमें दक्षिणेश्वर काली की महत्वपूर्ण मंदिर है, जहा तांत्रिक तंत्र विद्या की सिद्दी के लिए दूर-दूर से आया करते है।  जिसमें काली का मुंह दक्षिण की ओर है यही इसकी महत्ता है। इसका इतिहासिक महत्व इसलिए भी है कि यहाँ हिन्दू धर्म के 56 कोट के सभी देवी देवताओं  की प्रतिमाएँ हैं।

सोफा मंदिर पश्चिमी चम्पारण बिहार के गौनाहा प्रखंड मे है। इस मंदिर को किसी ने नहीं बनवाया ये भगवान के द्वारा बनाया गया है। नरकटियागंज से 30 km. और गौनाहा से 5km. पर है, ये मंदिर डोमाठ गांव के पास है।

आस्था के आगे राजा क्या और रंक क्या। कहते है आस्था और भक्ति का संगम हो तो दुरियां चंद फासलों में सिमट जाती है। आस्था और भक्ति के संगम का अद्भूत नजारा गुरुवार को थरूहट क्षेत्र के ऐतिहासिक सुभद्रा स्थान पर देखने को मिलेगा।

प्रियदर्शी सम्राट अशोक ने धर्मलेख जो छह ठोस पत्थरो के स्तंभो पर खुदवाया था उसमें से एक पूर्वी चम्पारण जिले के अरेराज लौरिया में 249 (वीसी) में लगाया था जो आज भी सुरक्षित है। इतिहास के अनुसार सम्राट अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 26 वर्ष वाद यह धर्मलेख लिखवाया था। यह धर्मलेख स्तंभ 34 टन वजन का है और 36 1/2 फीट ऊँचा है। इस स्तंभ के उपर का सिंह नहीं है जो शायद टूट जाने के कारण कोलकाता संग्रहालय में रखा हुआ है। इस स्तंभ पर 41 पंक्तियों में नागरिकों को मानव धर्म का पालन करने एवं पराचर मैत्री का संदेश है। स्तंभ स्थल को पर्यटन विभाग ने घेराबंदी कर संरक्षित कर दिया है।

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  • इसे भैंसालोटन के नाम से भी जाना जाता है। गंडक नदी के किनारे बसे इस जगह की गिनती बिहार के प्रसिद्व पिकनिक स्‍थल के रूप में की जाती है।
  • यहाँ पर विद्युत उत्‍पादन के लिए गंडक नदी के ऊपर एक बांध का भी निर्माण किया है जिसका उदघाटन तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था।
  • इस जगह को वाल्मीकि आश्रम के लिए भी जाना जाता है। माना जाता है कि रामायण के रचयिता महर्षि वाल्‍मीकि ने इसी आश्रम में अपना कुछ समय व्‍यतीत किया था। उनके नाम पर ही इस जगह का नाम भी वाल्‍मीकि नगर पड़ा था।
  • यहाँ पर एक भगवान शिव का प्राचीन मंदिर भी है जिसका निर्माण बेतिया के राजा द्वारा किया गया था।

नेपाल में धर्म त्योहारों, दैनिक अनुष्ठानों, पारिवारिक समारोहों और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ जीवन के हर पहलू में व्याप्त है। हर कदम पर आप मंदिर और धार्मिक स्थल, जुलूस और भक्ति संगीत देख सकते हैं। हालांकि नेपाल दुनिया के एकमात्र हिंदू राष्ट्र के रूप में प्रसिद्ध है, यह हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और अन्य मतावलंबियों द्वारा सहिष्णुता और सद्भाव में परस्पर प्रेम से बुनी गई एक जटिल और सुंदर चित्र-यवनिका है।

पशुपतिनाथ मंदिर देश में ऐतिहासिक रूप से सर्वाधिक पूज्य भगवान विनाशक, शिव हैं। उन्हें एक पवित्र तपस्वी के रूप में पूजा जा सकता है, उनकी पत्नी पार्वती के साथ दिखाया गया है, जहां वे एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे हाथ में डमरू धारण किए हुए हैं और अधिकतर तो लिंग-स्वरूप, उनकी उत्पादक शक्तियों का प्रतीक एक लंबोतरा पत्थर, में उनकी पूजा की जाती है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण लिंग काठमांडू के पश्चिम में पशुपतिनाथ के पवित्र मंदिर में स्थित है। आम तौर पर प्रत्येक शिव मंदिर के सामने शिव के वाहन, एक दिव्य बैल, नंदी की मूर्ति देखी जा सकती है। नेपाल में शिव का एक अन्य लोकप्रिय स्वरूप भयंकर भैरव हैं। भैरव के विभिन्न पहलू घाटी के त्योहारों में से कई में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

विष्णु, जिनका प्राथमिक कर्तव्य दुनिया और सभी जीवित रूपों के संरक्षण को आश्वस्त करना है, माना जाता है कि पृथ्वी पर दस बार, हर बार एक अलग अवतार के रूप में आ चुके हैं। उन्हें अक्सर एक सूअर, कछुआ, नर-सिंह और मछली के रूप में लिए गए उनके चार पशु अवतारों के रूप में दर्शाया जाता है। समस्त दक्षिण एशिया में उन्हें अक्सर दो प्रसिद्ध मानव स्वरूपों में पूजा जाता है: महाकाव्य रामायण के नायक राजकुमार राम और चरवाहा भगवान कृष्ण. नेपाल में वह अक्सर अपने नारायण के सर्वव्यापी स्वरूप में पूजे जाते हैं और उनकी सबसे सुंदर छवियों में से कुछ में उन्हें अपनी सवारी नर-गरुड़ पर सवार दिखाया जाता है। मंदिर वास्तुकला की पैगोडा शैली के हैं। इन में पैगोडा शैली की सभी विशेषताएं पाई जाती हैं, जैसे घनाकार निर्माण, सुंदरता से नक्काशी की गई लकड़ी की छत, जिस पर वे टिके हुए हैं (टुंडल). दो स्तर वाली छतें तांबे की हैं जिन पर सोने की परत चढ़ी है। इसके चार मुख्य द्वार हैं, सभी पर चांदी की चढ़ी हुई हैं। इस मंदिर का शिखर सोने का है, (गजूर), जो धार्मिक विचार का प्रतीक है। पश्चिमी द्वार पर बड़े बैल या नंदी की मूर्ति है, इसे भी सोने से मंडित किया गया है। देवता काले पत्थर के हैं, ऊंचाई में लगभग 6 फुट और परिधि में भी इतना ही.

आद्यप्ररूपीय मां या महिला, देवी का नेपाल में विशेष महत्व है। वे कई स्वरूपों में पूजी जाती हैं: दुर्गा संरक्षक और दानव महिषा का मर्दन करने वाली, घाटी शासकों की संरक्षक देवी तालेजू के रूप में और कुमारी के रूप में और जीवित कुंवारी देवी. अन्य स्त्री देवियों में शामिल हैं, लक्ष्मी, धन की देवी और सरस्वती, ज्ञान और कला की देवी. एक और व्यापक रूप से सम्मानित भगवान हैं, हाथी के सिर वाले गणेश, बाधाओं का हरण करने वाले और अच्छे भाग्य के स्रोत. अन्य देवता जैसे लाल मछेन्द्रनाथ, अकेले नेपाल में ही विशिष्ट हैं और अद्वितीय स्थानीय त्योहारों के साथ पूजे जाते हैं।

स्वयंभूनाथ बौद्ध धर्म के निभन्न स्वरूप नेपाल में प्रचलित हैं, संभवतः एक हजार वर्ष पूर्व भारत से बाहर गए प्राचीन बौद्ध धर्म से संबंधित है स्थानीय नेवार लोगों का बौद्ध धर्म; शेरपा, तमांग और तिब्बती लोगों का बौद्ध धर्म और थेरावादीन का अपेक्षाकृत आधुनिक क्षिप्राक्रमण या दक्षिण बौद्ध धर्म.

केंद्रीय विश्वास तथा प्रथाएं इसके संस्थापक राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के समय की हैं, जिनका जन्म लगभग 534 ईसा पूर्व में दक्षिणी तराई में लुम्बिनी में हुआ था। 29 वर्ष की आयु तक, अपने महल की दीवारों से बाहर की दुनिया की समस्याओं और पीड़ाओं से पूरी तरह अनजान, युवा राजकुमार ने अपने पिता के महल में एक संरक्षित जीवन जिया. एक दिन उन्होंने उन्हें महल से बाहर ले जाने के लिए अपने सारथी को मना लिया, जहां एक बूढ़े आदमी, एक बीमार आदमी, एक शव तथा एक तपस्वी को देख कर वे अन्यंत दुखी हुए. दुनिया के असली दुखों की अनुभूति ने राजकुमार को अपने वैभवशाली जीवन का परित्याग करने को प्रेरित किया और वे मानव पीड़ा को समाप्त करने के लिए ज्ञान की खोज में वनों में चले गए। गौतम ने कई वर्षों तक तपस्या की किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली. एक रात्रि को बोधगया के जंगल में एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया। इसके बाद से वे महात्मा बुद्ध, एक ज्ञानी कहलाए और उन्होंने ज्ञानोदय के लिए मध्यम मार्ग का उपदेश देते हुए उत्तरी भारत के चारों ओर तथा दक्षिणी नेपाल की यात्रा की. अस्सी वर्ष की उम्र में उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया।

लुम्बिनी लुम्बिनी, शाक्य राजकुमार और अंततः बुद्ध, एक प्रबुद्ध, सिद्धार्थ गौतम (गौतम बुद्ध) का जन्मस्थान, दुनिया के लाखों बौद्ध धर्म के सभी संप्रदायों के अनुयायियों के लिए एक तीर्थ स्थल है। भारतीय सम्राट अशोक के स्मारक स्तंभ से पहचाने जाने वाले इस जन्म स्थल को यूनेस्को ने एक विश्व विरासत स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया है।

लुम्बिनी में मुख्य आकर्षण 8 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ पवित्र बाग है, जिसमें ऐतिहासिक क्षेत्र के सभी खजाने रखे हैं। मायादेवी मंदिर तीर्थयात्रियों और पुरातत्वविदों के लिए समान रूप से एक मुख्य आकर्षण है। यहाँ हमें बुद्ध को जन्म देते हुए, उनकी माता मायादेवी की उत्कीर्ण मूर्ति मिलती है। मायादेवी मंदिर के पश्चिम में नेपाल का प्राचीनतम स्मारक, अशोक स्तंभ है। सम्राट अशोक 249 ईसा पूर्व में इस पवित्र स्थल की अपनी तीर्थयात्रा की स्मृति में यह स्तंभ बनवाया था। स्तंभ के दक्षिण में हमें दिखाई देता है पवित्र सरोवर, पुष्करणी, जहां रानी मायादेवी ने प्रभु बुद्ध को जन्म देने से पहले स्नान किया था।

अत्यंत निकट ही देखने योग्य अन्य स्थान हैं। यहां काठमांडू से भैरवा की हवाई यात्रा द्वारा पहुंचा जा सकता है। काठमांडू से यहां के बस या कार द्वारा लगभग आठ घंटे लगते हैं।

मुक्तिनाथ यह माना जाता है कि एक बार इस मंदिर में जाने से सभी प्रकार के कष्ट/शोक से राहत मिल जाती है (मुक्ति = निर्वाण, नाथ = भगवान). भगवान मुक्तिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर मुस्तांग जिले में, जोमसोम से 18 किमी उत्तर पूर्व में लगभग 3,749 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मुख्य मंदिर पैगोडा आकार में भगवान विष्णु को समर्पित एक मंदिर है। इसके चारों ओर दीवार में बने 108 नाले हैं जिन से पवित्र पानी डाला जाता है। मंदिर के एक ऊंची पर्वत श्रृंखला पर स्थित है और साफ मौसम के दौरान लोग यहां आते हैं। काठमांडू से मुक्तिनाथ जाने के दो मार्ग हैं। या तो काठमांडू से पोखरा होते हुए जोमसोम के लिए एक सीधी उड़ान ली जाए और कागबेनी होते हुए 7-8 घंटे पैदल यात्रा की जाए या पेखरा से ही पूरे रास्ते पैदल यात्रा की जाए जिस में 7-8 दिन लगते हैं। यह माना जाता है कि भारत में चार धामों की तीर्थ यात्रा के बाद इस मंदिर की यात्रा करनी चाहिए. इस मंदिर को बौद्धों के साथ ही हिंदुओं द्वारा भी पवित्र माना गया है। निकट ही स्थित ज्वाला माई मंदिर में एक झरना है और भूमिगत प्राकृतिक गैस से एक अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित रहती है। जोमसोम अन्नपूर्णा क्षेत्र में एक प्रमुख केंद्र है। जोमसोम में विश्व स्तरीय आवास सुविधाएं हैं जहां से एक उल्लेखनीय प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया जा सकता है।

गोसाइंकुंड नेपाल के सर्वाधिक प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है गोसाईंकुंड झील जो 436 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। काठमांडू से 132 उत्तर पूर्व की ओर स्थित गोसाईंकुंड जाने का सबसे अच्छा मार्ग धुंचे होकर है। धुंचे एक वाहनों के चलने योग्य सड़क मार्ग द्वारा काठमांडू के साथ जुड़ा हुआ है। उत्तर और दक्षिण में ऊंचे पहाड़ों से घिरी झील भव्य और सुन्दर है। वहाँ नौ अन्य सुंदर प्रसिद्ध झीलें भी हैं जैसे, सरस्वती, भैरव, सौर्य, गणेश कुंड आदि.

देवघाट देवघाट काली गंडकी और त्रिसूली नदियों के संगम पर स्थित एक लोकप्रिय तीर्थ स्थान है। यह निकट ही चितवन राष्ट्रीय उद्यान के उत्तर में स्थित है। जनवरी में मकर सक्रांति त्योहार के दौरान, हिंदू श्रद्धालु यहां नदी में पवित्र डुबकी लगाने के लिए एकत्र होते हैं। देवघाट के आसपास बहुत से दुर्लभ और ऐतिहासिक स्थल हैं जो दिलचस्प सहायक यात्राएं प्रदान करते हैं: त्रिवेणी मंदिर और बाल्मीकि आश्रम जहां महान ऋषि बाल्मीकि विश्राम किया था, सोमेश्वर कालिका मंदिर और किला, पांडवनाग जहां एक बार महाभारत के मुख्य पात्र रहे थे तथा पाल्पा के पूर्व राजाओं द्वारा निर्मित कबिलासपुर किला.

मनाकामना 3900 फुट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर स्थल, गणेश मानसलू और अन्नपूर्णा समूह के अति सुंदर दृश्य प्रस्तुत करता है। आसपास के गांव हालांकि 20वीं सदी के नेपाली बार रॉक और द्वित्तीय विश्व युद्ध की परिणति का एक मिश्रण है। मनाकामना भगवती मंदिर में पूजा करने के लिए हर दिन सैकड़ों लोग यात्रा करते हैं। जुलाई के अंत में या अगस्त के आरंभ में, नाग पंचमी के लिए, मनाने वाले श्रद्धालु पूरे मंदिर को फूल और पत्तियों से सजाते हैं। मनाकामना की यात्रा पर जाना एक बहुत ही नेपाली बात करना है और यदि आप एक बकरे की बलि नहीं भी देते हैं तब भी आपको ऐसा अनुभव होगा मानो आपको समाज में दीक्षा प्राप्त हो गई है।

पथिभरा (1763 मी) मेची राजमार्ग पर कुटिडंडा और हासपोखरी के ऊपर स्थित पथिभरा को छोटी पथिभरा कहा जाता है, क्योंकि तापलेजुंग में उन्हें पथिभरा की छोटी बहन के रूप में माना जाता है। इस हरे जंगल से आच्छादित पहाड़ी से मैदानी इलाकों, महाभारत श्रेणी और कंचनजंगा पर्वत के दर्शन किए जा सकते हैं। परिवहन सुविधाओं के बहुतायत से इस जगह ग्लाइडिंग के लिए प्रचुर मात्रा में व्यवहार्यता है। प्रतिदिन हजारों लोग देवी पथिभरा को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

जलेश्वर महादेव यह ऐतिहासिक जलेश्वर, जनकपुर क्षेत्र के मुख्यालय जलेस्वर शहर में स्थित है। जलेश्वर महादेव नेपाल के प्रमुख तीर्थ स्थानों में से एक है और हिंदू महाकाव्य, पदम पुराण में इसका उल्लेख किया गया है।

पौराणिक कथा के अनुसार, एक जगदीश नामक साधु जलेश्वर के एकांत जंगल में आया और उसने एक स्वप्न देखा जिसमें उसे उसी स्थान पर खुदाई करने का आदेश दिया गया था। स्वप्न के अनुसार उसने खुदाई शुरू की और जल्दी ही उसे जलेश्वर महादेव की एक प्रतिमा मिली. तब उसने कुछ सोने से, जो वह एक सुनुखादागढ़ नामक स्थान से लाया था, एक मंदिर का निर्माण किया।

जलेश्वर महादेव मंदिर के ठीक सामने दो पावन सरोवर हैं, जिन्हें वरुणसर और क्षीरसर कहा जाता है। रामनवमी तथा विवाह पंचमी उत्सवों के दौरान हजारों तीर्थयात्री इन सरोवरों पर एकत्र होते हैं।

डोलखा भीमसेन डोलखा टाउनशिप के ऊपरी भाग में भीमेश्वर का मंदिर स्थित है, जो डोलखा भीमसेन के नाम से अधिक लोकप्रिय है। डोलखा के लोग भीमेश्वर को अपने सर्वोच्च प्रभु के रूप में हैं। बिना छत के इस मंदिर में एक शिव लिंग है, जिसके नीचे एक पवित्र सरोवर है। इस मंदिर में बाल चतुर्दशी, राम नवमी, चैत्र अष्टमी और भीम एकादशी जैसे अवसरों पर इस मंदिर में मेले लगते हैं। दशईं त्योहार के दौरान, यहां बकरों की बलि दी जाती है।

भीमेश्वर मंदिर से लगभग 200 मीटर पर त्रिपुरसुंदरी का मंदिर है जहां चैत्र अष्टमी तथा दशईं के त्योहारों के दौरान श्रद्धालु एकत्र होते हैं। इस मंदिर में केवल इस मंदिर के पुजारी को ही मंदिर में रखी प्रतिमा के दर्शन करने की अनुमति है।

स्वर्गद्वारी प्यूथान (राप्ती क्षेत्र) जिले के पश्चिमी भाग में हिंदू तीर्थस्थल, स्वर्गद्वारी स्थित है। स्वर्गद्वारी प्यूथान के जिला मुख्यालय खालंगा बाजार के दक्षिण में लगभग 26 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बैसाख पूर्णिमा और कार्तिक पूर्णिमा के त्योहार पर नेपाल और भारत के विभिन्न भागों से तीर्थयात्री अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने आते हैं।

महर्षि वेदव्यास न केवल महाभारत के रचयिता हैं, बल्कि वह उन घटनाओ के भी साक्षी रहे हैं जो क्रमानुशार घटित हुई हैं। असल में इस महान धार्मिक ग्रंथ में व्यासजी की भी एक अदद भूमिका है। वेदव्यास उन मुनियों में से एक हैं, जिन्होंने अपने साहित्य और लेखन के माध्यम से सम्पूर्ण मानवता को यथार्थ और ज्ञान का खजाना दिया है।

महर्षि व्यास ने न केवल अपने आसपास हो रही घटनाओं को लिपिबद्ध किया, बल्कि वह उन घटनाओं पर बराबर परामर्श भी देते थे।

1. महर्षि वेदव्यास ने समस्त विवरणों के साथ महाभारत ग्रन्थ की रचना कुछ इस तरह की थी कि यह एक महान इतिहास बन गया।

हिन्दू धर्म में मान्यता है कि महाभारत में उल्लिखित घटनाएं सत्य और प्रमाणिक वृत्तांत है।

2. भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र भगवान गणेश ने वेदव्यास के मुख से निकली वाणी और वैदिक ज्ञान को लिपिबद्ध करने का काम किया था।

आम जनों को समझने में आसानी हो, इसलिए महर्षि व्यास ने अपने वैदिक ज्ञान को चार हिस्सों में विभाजित कर दिया। वेदों को आसान बनाने के लिए समय-समय पर इसमें संशोधन किए जाते रहे हैं। कहा जाता है कि महर्षि वेदव्यास ने इसे 28 बार संशोधित किया था।

4. महर्षि व्यास को भगवान विष्णु का 18वां अवतार माना जाता है। भगवान राम विष्णु के 17वें अवतार थे। बलराम और कृष्ण 19वें और 20वें।

इसके बारे में श्रीमद् भागवतम् में विस्तार से लिखा गया है, जिसकी रचना मुनि व्यास ने द्वापर युग के अन्त में किया था। श्रीमद् भागवतम् की रचना महाभारत की रचना के बाद की गई थी।

5. महर्षि व्यास का जन्म नेपाल में स्थित तानहु जिले के दमौली में हुआ था।

महर्षि व्यास ने जिस गुफा में बैठक महाभारत की रचना की थी, वह नेपाल में अब भी मौजूद है। इस मानचित्र के माध्यम से आप नेपाल में तानहू के बारे में जान सकते हैं।

3. महर्षि व्यास का जन्म त्रेता युग के अन्त में हुआ था। वह पूरे द्वापर युग तक जीवित रहे।

कहा जाता है कि महर्षि व्यास ने कलियुग के शुरू होने पर यहां से प्रयाण किया।

यही वह गुफा है, जहां बैठकर व्यास ने महाभारत की रचना की थी।

6. महर्षि वेदव्यास के पिता ऋषि पराशर थे। उनकी माता का नाम सत्यवती था।

पराशर यायावर ऋषि थे। एक नदी को पार करने के दौरान उन्हें नाव खेने वाली सुन्दर कन्या सत्यवती से प्रेम हो गया। उन्होंने सत्यवती से शारीरिक संबंध स्थापित करने अभिलाषा जताई। इसके बदले में सत्यवती ने उनसे वरदान मांगा कि उसका कन्याभाव कभी नष्ट न हो। यौवन जीवन पर्यन्त बरकार रहे और शरीर से मत्स्य गंध दूर हो जाए।

ऋषि पराशर ने सत्यवती को यह वरदान दिया और उनके साथ शारीरिक संबंध स्थापित किया। बाद में सत्यवती ने ऋषि व्यास को जन्म दिया।

पोखरा नेपाल की मैट्रोपोलिटन सिटी (महानगरपालिका) है। यह नेपाल का सबसे मुख्य दर्शनीय स्थल है। यहाँ अन्नपूर्णा सर्किट ट्रैक होने के कारण ट्रैकरों की भारी भीड़ रहती है। ऊँची पहाड़ी चोटियाँ, झील व नदी इस शहर के सौंदर्य में इज़ाफा कर देते हैं। पोखरा दर्शनीय स्थल आपको प्राकृतिक खूबसूरती के तरफ लेकर जाऐंगे जहाँ आपको ताज़गी भरी हवा अपने लपेटे में ले लेगी। सादगी भरा यह शहर घनिष्ठता को महत्व देता है। धार्मिक स्थलों की भी यहाँ कोई कमी नहीं है। यह स्थान धार्मिक, प्राकृतिक व रोमांचक स्थलों का संगम है। एक नए वातावरण में आकर भी अपनत्व महसूस करना बहुत बड़ी बात है। पर यहाँ आकर उस अपनत्व को महसूस किया जा सकता है।

10 पोखरा के दर्शनीय स्थल

पोखरा अतुलनीय नज़ारों का भंडार है जो साल भर पर्यटकों को आकर्षित करता है। जिसमे पोखरा रात का जीवन भी आपके सफर को यादगार बनाने में मदद करेगा। आपका परिचय संगीतमय दुनिया से होगा जहाँ आप पैर थिरकाते नहीं थकेंगे। रंगीन लाईटों की टिमटिमाहट आपको मदहोश कर देगी। यहाँ आकर विस्मरणीय सफर की नींव रखी जा सकती है। आइए चलते है पोखरा नेपाल दर्शनीय स्थल की सैर पर:

1. फेवा झील

Lake Fava

यह नेपाल की दूसरी सबसे बड़ी झील है। इसकी खास बात यह है कि इसके पारदर्शी जल में अन्नपूर्णा व धौलागिरी पर्वत श्रृंख्लाओं का प्रतिबिंब साफ झलकता है। आस-पास लगे पेड़-पौधे भी इस स्वच्छ जल में लहराते हुए दिखते है। नज़ारा इतना अद्भुत की आप बिना पलकें झपकाएँ घंटों तक बस इस झील के पानी को देख सकते है। आपको किसी साथी की भी ज़रूरत महसूस नहीं होगी। यहाँ बैठकर दुनिया के सबसे मनोरम सूर्यास्त के आप गवाह बन सकते है। ऐसा सौंदर्य जिसकी तुलना न की जा सके।

 

2. अन्नपूर्णा सर्किट

Annapurna Circuit

अन्नपूर्णा पर्वत श्रृंख्ला में यह हिमालय ट्रैक का सबसे मशहूर स्थान है जो ट्रैकर व पर्वतारोहियों का मुख्य केंद्र है। पर्वत की ऊँचाई छूने के एक अलग ही अनोखा-सा अनुभव होता है। उसी अनुभव को पर्यटक यहाँ जीने आते है। नेपाल पोखरा सिटी आपको इस स्थान के ज़रिए उस जगह पहुँचा देगी जहाँ से आप पूरे शहर व उसके आस-पास के संपूर्ण दृश्यों को अपनी आँखों में भर सकते हैं। अपने साथ कैमरा लेकर जाए और अधिक-से-अधिक तस्वीरों को बटोरकर अपने साथ लेकर आए। ताकि आपकी ये स्मृति विस्मरणीय बन जाए।

3. शांति स्तूप

Shanti stupa

इसे पीस पगोड़ा के नाम से भी जाना जाता है। यह अनाडू पर्वत पर स्थित है जहाँ से आप फेवा झील को भी देख पाऐंगे। हर तरफ पहाड़-ही-पहाड़ व उनके बीच बसा यह स्तूप अपने अस्तित्व का एहसास करवाता है। पोखरा दर्शनीय स्थल में यह बहुत प्रसिद्ध है। यहाँ आकर इस शोभित स्थान को छोड़ देना आपकी बहुत बड़ी भूल होगी।

 

4. इंटरनेशनल मांउनटेन म्यूज़ियम

International mountain museum

संग्रहालय में अनोखी कलाकृतियों, वास्तविक उपकरण, पर्वतों से जुड़ी अनसुनी कहानियाँ व तस्वीरें और कुछ ऐसे यात्रियों की तस्वीरें जो सबसे ऊँची पर्वत श्रृंख्ला तक पहुँच चुके हैं। संग्राहलय आपको हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के बारे में बताएगा 14 सबसे मशहूर व ऊँची चोटियों से परिचित करवाएगा। यह संग्राहलय मुख्य रूप से पर्वतारोहण के क्षेत्र में हासिल की कई उपलब्धियों का रिकॉर्ड रखने के लिए बनाया गया है। यह देखने लायक जगह है, आप इसे अपनी सूची में ज़रूर शामिल करें।

5. ताल बराही मंदिर

Tal Barahi Temple

पोखरा के टॉप पर्यटन स्थल में इस मंदिर का नाम भी शामिल है। इसके अन्य नाम है – झील मंदिर व वराही मंदिर। यह मंदिर वराही देवी को संमर्पित है जिन्हें माँ दुर्गा का ही रूप माना जाता है। यह दो मंज़िला पगोड़ा मंदिर है जो फेवा झील के छोटे-से द्वीप पर स्थित है। इस मंदिर की मान्यता हिन्दूओं व बौद्धिष्टों, दोनों के बीच है। यह मंदिर अराधना का केन्द्र है। इसकी मुख्य मूर्ति पारंपरिकता की झलक बिखेरती है जो लकड़ी, ईंट व पत्थर से बनी है। यह मान्यता है कि माँ दुर्गा ने वराही का अवतार राक्षसों को मारने के लिए लिया था। यह मंदिर शक्ति का प्रतीक है।

 

6. डेविस फॉल

Davis Fall

इस झरने की खास बात यह है कि ये ज़मीन के नीचे है जो 500 मीटर लंबी सुरंग बनाता है। इसके आस-पास का इलाका घने वृक्षों से घिरा हुआ है। यह बाकि सभी वॉटरफॉल से अलग है। पोखरा आकर प्राकृतिक नज़ारों से लबालब यह जगह देखना बेहद ज़रूरी हो जाता है। पोखरा में पर्यटन स्थल की कमी नहीं है पर इस जगह जाना मतलब प्रकृति को खुद में समा लेना। यह झील गुप्तेश्वर महादेव नामक गुफा से होकर गुज़रती है। यहाँ आपको नेपाली संस्कृति को देखने का भी अवसर मिलेगा।

 

7. सारंगकोट

Sarangkot

यह सारंगकोट पर्शत पर बसा एक ग्रामीण क्षेत्र है जो अद्भुत दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। यह समुद्र तल से 1600 मीटर की ऊँचाई पर बसा एक हरियालीयुकँत स्थान है। पर्यटकों के बीच यह पैराग्लाइडिंग का मुख्य केंद्र भी है। यहाँ से ढलते सूरज को देखना मतलब एक यादगार दृश्य को आँखों में समाना। यहाँ से अन्नपूर्णा, धौलागिरी, मनस्लू व पोखरा की घाटी का मनोरम दृश्य दिखता है। अलग-अलग ऐंगल से आप तस्वीरें खींच सकते हैं। यह विश्व की सबसे तेज़ ज़िपलाईन में से एक है। आप यहाँ शाम को टहल सकते है। उस दौरान चिड़ियों की चहचहाट आपका हृदय जीत लेगी।

 

8. गोरखा म्यूज़ियम

Gorkha Museum

पोखरा के महेंद्र पुल पर यह संग्राहलय स्थित है। पोखरा दर्शनीय स्थल के इस हिस्से में आकर आप गौरवान्वित महसूस करेंगे। यह संग्राहलय गोरखा सिपाहियों को समर्पित है जिन्होंने अपने अदम्य साहस से देश को हमेशा गर्व महसूस करवाया है। मौका आने पर इन्होंने देश को अपनी सेवा से कृतज्ञ किया है। यहाँ आकर आप गोरखा सिपाहियों के जीवन के बारे में जान सकेंगे। कैसे उन्होंने मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति से देश को बचाया है? ये आप यहाँ आकर बखूबी समझ पाऐंगे। तस्वीरों के ज़रिए आप इनके जीवन की तह तक पहुँच पाऐंगे। इससे अच्छा मौका आपको और कहीं नहीं मिलेगा कि आप उनके जीवन से कुछ पल के लिए जुड़ें।

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9. बैट केव

Bat cave

अगर आप अपने रोमांच को चरम-सीमा पर पहुँचाना चाहते हैं, तो यह जगह खास आपके लिए है। जैसा कि आप नाम से समझ गए होंगे कि यह एक ऐसी गुफा है जहाँ आपको हज़ारों की तादाद में चमगादड़ दिखेंगे। अँधेरी गुफा में हर तरफ उल्टे लटके चमगादड़, सोचिए कितना रोमांचक होगा! पतली गुफाओं से होकर गुज़रते हुए आप इस गुफा को अपनी पोखरा यात्रा का हिस्सा बना सकते है।

10. तिब्बती शरणार्थी कैंप

Tibetan Refugee Camp

यह रिफ्यूज़ी कैप उन हज़ारों लोगों के लिए बनाए गए थे जो चीन पर कब्ज़ा होने के बाद नेपाल आए थे। यहाँ तिब्बती लोग हाथ से बने गहनें, हल्की वस्तुऐं, कारपेट, कला कृति बेचते है। तिब्बत की पारंपरिकता इन वस्तुओं में साफ दिखाई पड़ती है। यही वस्तुएऐं यहाँ का मुख्य आकर्षण है जिन्हें पर्यटक स्मृति के तौर पर अपने साथ ले जाते है।

 

मगदी जिले के धनन गाँव में एक प्रसिद्ध गलेसौर महादेव मंदिर है। कालीगंडकी और राहुगंगा नदियों के संगम के पास स्थित इस तीर्थ का नाम जडेश्वर और जडभरेश्वर है। स्वास्तिअनि में वर्णित कहानी के संदर्भ के अनुसार, सती देवी का गला इसी स्थान पर गिरा था। माना जाता है कि प्राचीन काल में जदभारत ने तपस्या की थी। इसलिए, एक लोकप्रिय धारणा है कि जादवतेश्वर और जडेश्वर के नाम चले गए हैं। यह महादेव मंदिर शालिग्राम नदी कालीगंडकी नदी के तट पर स्थापित किया गया था और इसका धार्मिक महत्व बहुत महत्व है। यह भी माना जाता है कि जूड भरत ने राजा रीगन का संदेश इस जगह पर दिया था।
यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं है कि गल्लेश्वर महादेव की स्थापना कब हुई थी। लेकिन यहां पर गेंदबाजी ही पूजा है। इसकी पूजा के उद्देश्य के लिए, वी.एस. १ ९ ५ ९ में, पृथ्वीवीर शाह ने गाँठ स्थापित की है। वर्तमान मंदिर 5 साल में बनाया गया। यह मंदिर शैली में बनाया गया है। दो विकल्प हैं। मंदिर में गलेश्वर महादेव के प्राकृतिक शिवलिंग के साथ-साथ शालिग्राम भी रखे गए हैं। त्रिनेत्र, घंटियाँ और नदी की मूर्तियाँ भी मंदिर को निहार रही हैं।
जुलाई के महीने में बालाचराशी, शिवरात्रि और गल्लेश्वर महादेवन में एक बड़ा मेला लगता है। ऐसी मान्यता है कि मुक्तिनाथ के दर्शन महेश्वरा के दर्शन से ही होने चाहिए।

माना जाता है कि मायागड़ी जिले के धनन गाँव में गलेश्वोर का मंदिर उसी स्थान पर स्थापित किया गया था जहाँ सती देवी का गला गिरा था।

मंदिर को जदेश्वर और जडाभेशवर्श के नाम से भी जाना जाता है और इसे कलिगांदकी नदी के तट पर स्थित होने के कारण एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल माना जाता है। मूल मंदिर की स्थापना की तिथि अज्ञात है। हालाँकि, वर्तमान संरचना, 1963 ई। में बनाई गई थी। पूजा की वस्तु एक चट्टान है, जिसके साथ शालिग्राम, त्रिशूल, नंदी की एक मूर्ति और घंटियाँ हैं। उत्सवों के मुख्य अवसर शिवरात्रि, बालाचतुर्दशी, और श्रावण के पूरे महीने के त्योहार हैं।

मुक्तिनाथ वैष्‍णव संप्रदाय के प्रमुख मंदिरों में से एक है। यह तीर्थस्‍थान शालिग्राम भगवान के लिए प्रसिद्ध है। शालिग्राम दरअसल एक पवित्र पत्‍थर होता है जिसको हिंदू धर्म में पूजनीय माना जाता है। यह मुख्‍य रूप से नेपाल की ओर प्रवाहित होने वाली काली गण्‍डकी नदी में पाया जाता है। जिस क्षेत्र में मुक्तिनाथ स्थित हैं उसको मुक्तिक्षेत्र’ के नाम से जाना जाता हैं। हिंदू धार्मिक मान्‍यताओं के अनुसार यह वह क्षेत्र है, जहां लोगों को मुक्ति या मोक्ष प्राप्‍त होता है। मुक्तिनाथ की यात्रा काफी मुश्किल है। फिर भी हिंदू धर्मावलंबी बड़ी संख्‍या में यहां

 

पौराणिकता

मुक्तिनाथ 108 दिव्‍य देशों में से एक है। यह ‘दिव्‍य देश’ वैष्‍णवों का पवित्र मंदिर होता है। पारंपरिक रूप से विष्‍णु शालिग्राम शिला या शालिग्राम पत्‍थर के रूप में पूजे जाते हैं। इस पत्‍थर का निर्माण प्रागैतिहासिक काल में पाए जाने वाले कीटों के जीवाश्‍म से हुआ था, जो मुख्‍यत: टेथिस सागर में पाए जाते थे। जहां अब हिमालय पर्वत है। पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार शालिग्राम शिला में विष्‍णु का निवास होता है। इस संबंध में अनेक पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं। इन्‍हीं कथाओं में से एक के अनुसार जब भगवान शिव जालंधर नामक असुर से युद्ध नहीं जीत पा रहे थे तो भगवान विष्‍णु ने उनकी मदद की थी। कथाओं में कहा गया है कि जब तक असुर जालंधर की पत्‍नी वृंदा अपने सतीत्‍व को बचाए रखती तब तक जालंधर को कोई पराजीत नहीं कर सकता था। ऐसे में भगवान विष्‍णु ने जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के सतीत्‍व को नष्‍ट करने में सफल हो गए। जब वृंदा को इस बात का अहसास हुआ तबतक काफी देर हो चुकी थी। इससे दुखी वृंदा ने भगवान विष्‍णु को कीड़े-मकोड़े बनकर जीवन व्‍यतीत करने का शाप दे डाला। फलस्‍वरूप कालांतर में शालिग्राम पत्‍थर का निर्माण हुआ, जो हिंदू धर्म में आराध्‍य हैं। पुरानी दंतकथाओं के अनुसार मुक्तिक्षेत्र वह स्‍थान है जहां पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहीं पर भगवान विष्‍णु शालिग्राम पत्‍थर में निवास करते हैं। मुक्तिनाथ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी एक महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। इसी स्‍थान से होकर उत्‍तरी-पश्चिमी क्षेत्र के महान बौद्ध भिक्षु पद्मसंभव बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए तिब्‍बत गए थे।

तीर्थाटन के लिए आते हैं। यात्रा के दौरान हिमालय पर्वत के एक बड़े हिस्‍से को लांघना होता है। यह हिंदू धर्म के दूरस्‍थ तीर्थस्‍थानों में से एक है।

यात्रा

मुक्तिनाथ हेलिकॉप्‍टर के द्वारा पोखरा-मुक्तिनाथ मार्ग या जोमसोम मार्ग से भी एक दिन में जाया जा सकता है। इस मार्ग ने परंपरागत चढ़ाई के रास्‍ते को कुछ हद तक कम किया है। लेकिन आज भी आम लोग मुक्तिनाथ जाने के लिए चढ़ाई को ही प्राथमिकता देते हैं। चढ़ाई के समय दो अलग-अलग रास्‍ते मिलते हैं, जो काली गंडक नदी के पास तातोपानी नामक जगह पर जाकर आपस में मिल जाती है। रास्‍ते में आमतौर पर सभी जगहों पर रुकने के लिए निजी लॉज मिल जाते हैं। ये लॉज सभी तरह की मुलभूत सुविधाएं मुहैया कराते हैं। कई बार तो यात्रियों के लिए काफी बेहतर सुविधाएं भी उपलब्‍ध कराई जाती हैं। इन सबके बावजूद तीर्थयात्रियों को अपने साथ स्लिपींग बैग भी जरूर ले जाना चाहिए ताकि किसी भी तरह के अतिरिक्‍त परेशानियों से बचा जा सके। यात्रा के दौरान मार्ग में पिट्ठू आसानी से उपलब्‍ध हो जाते हें। इन पिट्ठुओं को यात्रियों के द्वारा ही भोजन दिया जाता है। चूंकि इस मार्ग का उपयोग विदेशियों के द्वारा भी किया जाता है, अत: यहां खाने की अच्‍छी व्‍यवस्‍था होती है। भोजन में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के भोजन उपलब्‍ध रहते हैं। इसके अलावा सीलबंद पानी भी आसानी से मिल जाता है। लेकिन सामान्‍यत: नेपाली शैली का भोजन दाल-भात आसानी से मिलता है। अगर आप गाइड रखना चाहते हैं तो वह भी मिल सकता है।

मुक्तिनाथ की यात्रा 5-6 दिनों में पूरी होती है।

पहला‍ दिन

काठमांडु से 200 कि॰मी॰ पश्चिम में स्थित पोखरा से बस के द्वारा यात्रा प्रारंभ होती है। इस दौरान आप पोखरा शहर को देखने का लुत्‍फ उठा सकते हैं।

दूसरा दिन

यहां से 20 मिनट की हवाई यात्रा करके जोमसोम जाना होता है। इसके बाद 2 घंटे की चढ़ाई के उपरांत कागबेणी में रात्रि विश्राम कर सकते हैं। मध्‍यकालीन शैली में बसे छोटे-छोटे तिब्‍बती गांवों के अलावा वहां के खूबसूरत वातावरण का भी मजा लिया जा सकता है।

तीसरा दिन

मुक्तिनाथ के लिए 6 घंटे लंबी चढ़ाई की शुरूआत होती है। मध्‍यमार्ग में आप लंच ले सकते हैं। इसके बाद पवित्र स्‍नान के उपरांत पूजा-अर्चना प्रारंभ हो जाती है।

चौथा दिन

सुबह के नास्‍ते के बाद उतरने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। जोमसोम में पहली रात गुजारना होता है।

पांचवां दिन

अगले सुबह पोखरा के लिए हवाई मार्ग से जाना होता है। इसके बाद काठमांडु के लिए उपलब्‍ध माध्‍यमों के द्वारा प्रस्‍थान किया जाता है।

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आज से करीब दो अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर सृष्टि की शुरुआत हुई थी। साथ ही करीब 10 करोड़ वर्ष पूर्व क्षीर सागर जब उठकर हिमालय बना था, उसके बाद करीब तीन करोड़ वर्ष सरिसृप युग रहा था और उसके बाद विश्व ब्रह्माण्ड में सभ्यता की शुरुआत जम्बूद्वीप के आर्यावर्त से हुई थी।

पृथ्वी सात द्वीपों में विभाजीत। उस में सर्व प्रथम मानव सभ्यता का विकास सरीसृप युग के बाद जम्बूद्वीप में हुआ। उस जम्बूद्वीप में चार क्षेत्र, चार धाम, सप्तपुरी आदि का वर्णन मिलता है। उस क्षेत्र में प्रमुख क्षेत्र मुक्ति (Muktinatha Dham) क्षेत्र हिमवत खण्ड हिमालय नेपाल में पड़ता है। वैसे ही नेपाल के पूर्व दिशा में वराह क्षेत्र नेपाल से बहने वाली गण्डकी नारायणी और गंगा के संगम में हरिहर क्षेत्र और विश्व प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र भारत में पड़ता है।

शाण्डिल्य ऋषि द्वारा संरक्षित गण्डकी नदियों में प्रमुख काली गण्डकी में अवस्थित शालग्राम पर्वत और दामोदर कुंड के बीच भाग में त्रिदेवों में एक ब्रह्मा ने मुक्तिक्षेत्र (Muktinatha Dham) में यज्ञ किया था। उस यज्ञ के प्रभाव से अग्नि ज्वाला रूप में रुद्र भगवान शिव और शीतल जल के रूप में भगवान नारायण विष्णु उत्पन्न हुए थे। इसी से सर्व पाप विनाशिनी मुक्तिक्षेत्र का प्रादुर्भाव हुआ था और उस में सती वृंदा के शाप से शिला रूप होने का जो शाप भगवान विष्णु को मिला था उस शाप से मुक्ति के लिए शालग्राम शिला के रूप में उत्पन्न हुए थे। इसलिए इस क्षेत्र का नाम मुक्तिक्षेत्र हुआ।

श्री भगवान मुक्तिनाथ एवं मुक्तिक्षेत्र की महत्ता पूजा अर्चना वैदिक काल एवं पौराणिक काल से अनवरत चली आ रही है। उपनिषद् एवं ब्रह्मसूत्र तथा स्कंद, वाराह, पद्म, ब्रह्माण्ड सहित सभी पुराणों में मुक्तिक्षेत्र व शालग्राम अर्चना विधि का विस्तार से वर्णन मिलता है।

श्री भगवान मुक्तिनाथ नारायण का स्वरूप आदि शालग्राम स्वरूप जो सती वृंदा के शाप के कारण भगवान विष्णु ने गण्डकी नदी में शिला रूप धारण करके मोक्ष प्राप्त किया था। अन्य शालग्राम भगवान नारायण के आज्ञा स्वरूप विश्वकर्मा ने बज्रकीट के रूप धारण करके सहस्र वर्षों तक विभिन्न रूपों एवं शालग्राम शिला निर्माण करके शालग्राम पर्वत प्रकट किए।

ऐतिहासिक काल में आदि शालिग्राम गर्भ गृह में स्थापित करके बाहर भगवान नारायण की मूर्ति मुक्तिनाथ नारायण तथा बुद्ध भगवान लोकेश्वर जैसी भी लगती है। इसलिए यह हिंदू और बौद्ध धर्म को मानने वालों के बीच आस्था और धार्मिक सहिष्णुता का केन्द्र बना हुआ है।

इसी तरह विभिन्न पुराणों में वर्णित कथानुसार भगवान श्री बद्रीनाथ और मुक्तिनाथ के बीच में अनन्य संबंध है क्योंकि भगवान बदरीनाथ के गर्भगृह में शालग्राम भगवान की पूजा होती है। इसी तरह भगवान जगन्नाथ का भी दारु विग्रह है और उनके गर्भगृह में भी शालग्राम भगवान की पूजा होती है।

मुक्तिनाथ धाम के दामोदर कुंड जलधारा और गण्डकी नदी के संगम को काकवेणी कहते हैं। इस जगह पर तर्पण करने से 21 पीढियों का उद्धार हो जाता है।

रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मिकी का आश्रम भी गण्डकी नदी के किनारे स्थित था। यहीं पर देवी सीता ने लव-कुश को जन्म दिया था। आज से 300 साल पहले अयोध्या में जन्मे अद्भुत बालक स्वामी नारायण ने भी मुक्तक्षेत्र और काकवेणी के मध्य एक शिला पर कठोर तप करके सिद्धि प्राप्त की थी।

श्रीमद्भागवत महापुराण आदि ग्रंथों के अनुसार कलियुग के पांच हजार वर्ष बाद गंगा आदि नदियां अपवित्र हो जाएंगी और सिर्फ पानी रह जाएगा। केवल गंडकी नदी कलियुग के दस हजार वर्ष पर्यन्त पवित्र रहेगी। अंत में, मुक्तिक्षेत्र हिंदू और बौद्ध धर्म के महान एवं पुरातन धार्मिक आस्था के केन्द्र हैं तथा मुक्तिक्षेत्र एवं भगवान मुक्तिनाथ समस्त जगत के कल्याण के लिए धरा पर अवतरित हैं।