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राम के जीवन की यात्राये | Tirth Darshan
Wednesday, September 23, 2020

जय सियाराम

श्री राम ने गुरु वशिष्ठ की आज्ञा तथा उनके साथ विद्यार्थी जीवन में ही देश काल व परिस्थिति की जानकारी के लिये देशाटन किया था । श्री राम दशरथ नरेश के ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते आर्य भरत खण्ड के भावी सम्राट थे । अतः गुरु वशिष्ठ जी ने उन्हें सभी व्यवहारिक ज्ञान देने के लिये अखण्ड आर्यावर्त्त की यात्रा करवाई थी ।

आज भी हमारे अधिकारी वर्ग को कार्यभार संभालने के दौरान देश भ्रमण के लिये भेजा जाता है ताकि वे देश को समझ सकें । इसके अलावा सनातन संस्कृति के वाहक संत और मनीषियों के संन्यास आश्रम में प्रवेश पश्चात देशाटन की परंपरा आज भी यथावत बनी हुई है ।

इसी तरह रामजी ने अपने आरंभिक जीवन में यात्रायें की इसका उल्लेख मिलता है । इसे हम रामजी की प्रथम यात्रा मानते हैं । पर इसके संबंध में समुचित शोध साधनों के अभाव में नहीं हो पाया है । अतः इससे संबंधित स्थल वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं कराये गये हैं ।

यदि आपकी जानकारी में इस तरह की यात्रा से संबंधित विवरण हैं तो हमें उपलब्ध करायें ।

कामेश्वरनाथ कारोधाम

कारोधाम में अवस्थित कामेश्वर मंदिर अत्यंत प्राचीन तीर्थ है । अयोध्या से अपने आश्रम की ओर बढ़ते हुए मुनि विश्वामित्र जी ने श्रीराम को बताया था कि भगवान शिव ने कामदेव को यहां भस्म किया था। आज भी यहां शिव मंदिर तथा तालाब है। माना जाता है कि यहां भगवान शिव ने तपस्या की थी।

ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 1/23/9 से 16, मानस 1/205 दोहे से 1/208/2 तक

आगे का मार्ग
कामेश्वरनाथ से सुजायतः- कारांे – पुराचक – मऊ रोड़ – धर्मपुर – रसूलपुर -सुजायत मऊ रोड़ से 7 कि.मी

सुजायत व मरची

सुबाहु डीह त्रेता युग से संबंधित महत्वपूर्ण धरोहर है । उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में चिटबड़ा गाँव के पास जंगल में एक प्राचीन टीला है। इसे सुबाहू का घर माना जाता है। सुजायत सुबाहू से बना है।

टीले के पास खुदाई में ताड़ का रस निकालने के पात्र, चिमटा, भट्ठी तथा कौड़ियाँ आदि मिली हैं। टीले के पास ही एक प्राचीन पोखरा भी मिला है। यहाँ से 2 कि.मी. दूर मरची नामक गाँव मारीच का गाँव माना जाता है। क्योंकि यह गाँव उजड़ कर दूसरे स्थान पर बस गया है अतः अब स्थान नहीं केवल मारीच का नाम बचा है।

ग्रंथ उल्लेख

वा.रा. 1/30/16 से 23 मानस 1/209/2, 3

आगे का मार्ग

सुजायत से भरोली उजियार अहिल्या स्थल:- सुजायत-खलीलपुर- भरोली-ताजपुर-करीमुद्दीन पुर रे. स्टेशन – दाऊदपुर -मुहम्मदाबाद -नूरपुर-गाजीपुर-बक्सर।राष्ट्रीय राजमार्ग-19, मऊ रोड़, 53 कि.मी.।

नोट भरोली उजियार से यात्री बक्सर शहर आयें।

यहां 17 राम रेखा घाट पर गंगा स्नान करके, 18 रामेश्वर नाथ, 15 चरित्र वन, 14 वामनेश्वर मंदिर, 16 विश्वामित्र आश्रम तथा अंत में 19 अहिल्या स्थल के दर्शन करें।

भरोली व उजियारा बलिया उत्तर प्रदेश

रामायण के अनुसार विश्वामित्र मुनि ने श्रीराम लक्ष्मण जी को रात्रि रहते ही उठाया तथा कुछ सामान्य क्रियाओं के बाद वे आश्रम को चल पड़े थे। इस क्षेत्र में एक कहावत है: -भोर भरोली भए उजियारा, बक्सर जाय ताड़का मारा अर्थात श्रीराम को जहाँ भोर हुई वहाँ भरोली गाँव है तथा जहाँ प्रकाश हुआ वहाँ उजियार गाँव बसा है।

इनमें आपसी अंतर भी लगभग 2 कि.मी. ही है।

वा.रा. 1/24/1

वामनेश्वर मंदिर बक्सर बिहार

माना जाता है कि वामनावतार लेने से पूर्व भगवान विष्णु जी ने यहां भगवान शिव की पूजा की थी। यहां भगवान विष्णु द्वारा स्थापित वामनेश्वर शिवलिंग श्रद्धा स्थल है। विश्वामित्र जी ने श्रीराम को इसके दर्शन करवाये थे।

वा.रा. 1/29/1 से 12 तक

चरित्र वन बक्सर बिहार

 

श्रीराम ने  अपने जीवन का प्रथम युद्ध यहाँ किया था। यहीं से उनके वीर चरित्र का उद्भव माना जाता है। इसे ताड़का वन भी कहा जाता है। रामायण के अनुसार ताड़का डेढ़ योजन का मार्ग घेर कर रहती थी। यहीं श्रीराम ने ताड़का को मारा था। यह स्थान बक्सर में ही है।

वा.रा. 1/24/12 से 32 1/25 तथा 26 पूरे अध्याय

मानस 1/208/3, मानस 1/205 दोहे से 1/208/2 तक।

राम रेखा घाट बक्सर बिहार

 

बक्सर में गंगाजी के किनारे रामरेखा घाट अत्यंत प्रसिद्ध स्थल है। माना जाता है कि ताड़का वध के पश्चात् श्रीराम ने यहाँ स्नान किया था। इस स्थान को श्रीराम का दो बार सान्निध्य प्राप्त हुआ है। श्रीराम सिंहासन आरूढ़ होने के पश्चात् यहाँ यज्ञ करने आये थे तब उन्होंने तीर की नोक से यहाँ यज्ञ स्थल की सीमा रेखाएँ खेंची थी।

वा.रा. 1/29 पूरा अध्याय, मानस 1/209 दोहा तथा 1/209/1, 2, 3

रामेश्वर नाथ बक्सर बिहार

 

माना जाता है कि ताड़का वध के पश्चात् श्री राम के मन में स्त्रीवध के कारण ग्लानि थी क्योंकि उनके वंश में पहले किसी ने स्त्री का वध नहीं किया था। तब उन्होंने भगवान शिव की विशेष पूजा की थी।

यदि हम वाल्मीकि रामायण का पारायण करें तो बड़ी साफ उल्लेख मिलता है कि यक्षिणी ताटका का स्वरूप बड़ा भयंकर था लेकिन राम स्त्री होने के कारण उसका वध नहीं करना चाहते थे पर मुनि विश्वामित्र ने उन्हें समझाया कि राम संकोच मत करो, लोक उपकार के लिये इस मायाविनी दुष्टा का अंत करो । गुरु के आदेश पर श्री राम ने ताटका का वध कर दिया । लेकिन कहीं न कहीं उनके मन में थोड़ी सी कचोट और ग्लानि बनी रही । इसीलिये उन्होंने अपने आराध्य भोलेनाथ की विशेष पूजा अर्चना की ।

जिस स्थल पर रामजी ने भोलेनाथ की आराधना की वह अब रामेश्वर नाथ के नाम से प्रसिद्ध मन्दिर है। यह स्थान रामरेखा घाट के पास ही है।

विश्वास किया जाता है कि स्त्री घातक व्यक्ति यहाँ प्रायश्चित स्वरूप विशेष पूजन करे तो उसे अपने पाप से मुक्ति मिल जाती है ।

वा.रा. 1/30/26 मानस 1/209/4 से 5

अहल्या आश्रम अहरौली बक्सर बिहार

 

अहरौली आश्रम बक्सर से 3 कि.मी. पूर्व दिशा में अहरौली नामक गाँव है। अहरौली अहिल्या से बना है। माना जाता है कि श्रीराम ने यहाँ अहिल्याजी का उद्धार किया था।

श्रीराम चरित मानस के अनुसार श्रीराम ने सिद्धाश्रम से चलते ही अर्थात् गंगा तथा सोनभद्र पार करने से पूर्व ही अहिल्याजी का उद्धार किया था। तुलसी दास जी के अनुसार यही स्थान ठीक लगता है।

ग्रंथ उल्लेख

मानस दोहा 1/209/6 से 1/210/ छंद -4 तक

आगे का मार्ग

अहिल्या स्थल से त्रिगनाघाट- सोणभद्र परेवः – अहरोली – चूरामनपुर – मरौतिया – चन्दा – भोजपुर -चैकिया -राष्ट्रीय        राजमार्ग84 – आरा बक्सर रोड़ – रानीपुर-रामगढ़ – रानी सागर – ईश्वरपुरा – गजराज गंज – अखत्यिारपुर – अवधपुरी – ओल्ड पुलिस लाईन – कीमनगर – कोइलवर। राष्ट्रीय राजमार्ग – 84, 85 कि.मी.।

परेव पटना बिहार

 

परेव पड़ाव का अपभ्रंश है। माना जाता है कि श्री राम लक्ष्मण जी तथा विश्वामित्र जी ने यहां पड़ाव डाला था। यह स्थान कोइलवर पुल के पास है। निकट ही मोहनेश्वर महादेव का मंदिर है। कुछ लोगों का विचार है कि उन्होंने सोनभद्र नदी त्रिगना घाट से पार की थी। दोनों में लगभग 5 कि.मी. का अन्तर है।

वा.रा. 1/31/19, 20, 1/32/9, 10 1/35/1 से 5

सोणभद्र परेव से रामचैरा मंदिरः- परेव-पटना-गंगाजी का पुल पार कर लगभग 8 कि.मी. आगे जाते समय बाएँ हाँथ को गंगा जी के किनारे स्थित है।

दशरथ जी का महल अयोध्या फैजाबाद उत्तर प्रदेश

 

  1. हम सभी जानते हैं कि अयोध्याजी श्रीराम की जन्मभूमि है। वर्तमान काल में बड़ा स्थान के रूप में विख्यात मंदिर स्थल पर प्राचीन काल में अयोध्या के प्रतापी सम्राट दशरथ जी का महल था । यहीं श्री रामजी सहित चारों भाइयों की बाल्यावस्था बीती । श्रीराम ने यहीं से वन की यात्रा आरम्भ की थी। अयोध्याजी से 10-12 कि.मी. के घेरे में गया,वेदी कुण्ड, सीता कुण्ड, जनौरा (जनकौरा) आदि अनेक स्थल किसी न किसी रूप में श्रीराम वनवास से जुडे़ हैं।
  2. श्री राम ग्रंथों में उल्लेख
    वा.रा. 2/1 से 44 तक सभी पूरे अध्याय, मानस 1/346 दोहा से 2/84 दोहे तक
  3. दशरथ महल से तमसा तट कैसे पहुँचें
    बड़ा स्थान से तमसा तटः- अयोध्याजी – न्यू कॉलोनी – प्रोफेसरकॉलोनी मोहताशिपुर – अकबरपुर – तमसा तट। एस. एच. 9 से 25 कि.मी. दर्शन नगर-भरतकुण्ड रोड से 18 कि.मी. पैदल मार्ग भी है

मखौड़ा धाम अयोध्या

 

ये है मखौड़ा धाम । अयोध्या नरेश दशरथ जी ने श्रृंगी ऋषि के निर्देशन में पुत्रेष्टि यज्ञ यहीं किया था । मनोरमा नदी के तट पर अवस्थित यह तीर्थ आजa भी प्रख्यात है । संतान प्राप्ति की कामना से लोग आज भी यहां बड़ी संख्या में मनौती मांगने के लिये आते हैं । संतान प्राप्ति के बाद यहाँ आकर धूमधाम से पूजन और दर्शन करते हैं ।

ग्रंथ उल्लेख

वा. रा. 1/22/11 से 24 तक मानस 1/205 दोहे से 1/208/4 तक ।

आगे का मार्ग

यज्ञ स्थल से श्रृंगी आश्रमः- मखौड़ा-महबूबगंज-शेरवाघाट 22 कि. मी

श्रृंगी ऋषि आश्रम शेरवा घाट

 

ये है श्रृंगी ऋषि आश्रम । उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में अयोध्याजी से कुछ दूरी पर शेरवा घाट में अवस्थित ये आश्रम ऐतिहासिक महत्व का है ।

रामायण ग्रंथ का पारायण करने वाले हम सभी जानते हैं कि त्रेता युग में अयोध्याजी से कुछ दूर चलने के बाद अगले प्रातःकाल मुनि विश्वामित्र ने राम जी को बला और अति बला विद्या की शिक्षा दी थी । सरयू जी के तट पर रामजी ने सभी विद्याओं की माता कही जाने वाली ये विद्या प्राप्त की थी ।

ये लीला यहीं घटित हुई ।

इसके अलावा रामजी के जन्म के लिये हुए पुत्रेष्टि यज्ञ के ऋषि श्रृंगी को इसी क्षेत्र में ठहराया गया था जिसकी स्मृति आज तक बनी हुई है । शांता माता और श्रृंगी ऋषि की देव रूप में पूजा यहाँ प्राचीन काले से होती आ रही है ।

शेरवाघाट के पास महबूब गंज से 3 कि.मी. उत्तर दिशा में सरयू के किनारे प्राचीन शृंगी आश्रम है। यदि सरयू के किनारे-किनारे आएं तो यह स्थल अयोध्या जी से लगभग 20 कि.मी. पड़ता है। यहाँ अनेक संतों की कुटियाँ हैं।

संतजन मानते हैं कि ऋषि विश्वामित्र ने यहीं श्रीराम को बला तथा अतिबला की शिक्षा दी थी। यह भी माना जाता है कि उस समय भी यहाँ अनेक ऋषि रहते थे। उन्हीं के आश्रम में ऋषि विश्वामित्र ने श्रीराम लक्ष्मण के साथ विश्राम किया था।

ग्रंथ उल्लेख वा.रा. 1/22/11 से 24 तक। मानस 1/205 दोहे से 1/208/2 तक, 1/208/4

आगे का मार्ग

श्रृंगी आश्रम से भैरव मन्दिरः- शेरवाघाट-महबूबगंज-महराजगंज-भैरव मंदिर 39 कि. मी.

भैरव मंदिर

 

ये है भैरव मंदिर तीर्थ । यह तीर्थ उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले में सरयू नदी के तट पर महाराजगंज में अवस्थित है । विश्वामित्र मुनि के साथ उनके आश्रम की रक्षा के लिये साथ चल रहे भगवान राम के साथ भैया लखन लाल इस मंदिर के निकट से आगे बढ़े थे । ये बड़ा ही भव्य और मनोरम तीर्थ है ।

सलोना ताल

 

अजमतगढ़ के पास पुरानी सरयू के किनारे एक अत्यन्त विशाल तालाब है जिसमें अब भी बड़ी मात्रा में जल रहता है। यह सरयू का पेटा कहा जाता है। लोक विश्वास के अनुसार मुनि विश्वामित्र इसी मार्ग से राम, लक्ष्मण जी को लेकर गये थे। तालाब के पास ही यहाँ राम वाटिका है तथा श्रीराम व शिवजी के कई प्राचीन मंदिर हैं। यह स्थान आजमगढ़ से लगभग 25 कि.मी. उत्तर पूर्व में है।

ग्रंथ उल्लेख

वा.रा. 1/22/11 से 24 तक। मानस 1/205 दोहे से 1/208/2 तक।

आगे का मार्ग

सलोना ताल से बारदुवरिया मन्दिरः- अजमतगढ़ – जमीर शेखपुर – भोपुरा- जमालपुर – मिर्जापुर – कल्यानपुर – कोपागंज – राजपुर – सरयू जी। 36 कि.मी. पैदल 29 कि.मी.

बारदुअरिया मंदिर

 

बारदुवारिया मंदिर यह स्थान रामघाट मऊ के निकट ही है। यहाँ पुरानी सरयू तथा टोंस नदी का संगम है। यहाँ भगवान शिव का 12 द्वारों का एक बहुत प्राचीन मंदिर है। आज भी यहाँ कार्तिक पूर्णिमा को एक बड़ा मेला लगता है।

लोक मान्यता के अनुसार विश्वामित्र मुनि श्रीराम लक्ष्मण को इसी मार्ग से ले गये थे। इसका नाम बारह दुवारा भी है।

ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 1/22/11 से 24 तक। मानस 1/205 दोहे से 1/208/2 तक।

आगे का मार्ग
बारदुवारिया मन्दिर से रामघाटः- कोपागंज – मौहल्ला डोमपुरा-मऊ-मऊ बाईपास। 8 कि.मी. पैदल 7 कि.मी

राम घाट मऊ

 

रामघाट मऊ मऊ के निकट पुरानी सरयू के किनारे रामघाट है। माना जाता है कि यहाँ श्रीराम ने सरयू में स्नान किया था तथा वे विश्वामित्र मुनि के साथ इसी मार्ग से आश्रम गये थे। आज भी दूर-दूर से जनता यहाँ स्नान व मनौतियां माँगने आती हंै।

ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 1/22/11 से 24 तक। मानस 1/205 दोहे से 1/208/2 तक।

आगे का मार्ग
रामघाट से सिदागर घाटः- मऊ – मऊ बाईपास – कटरा – रायपुर-वाघपुर – सिदागर घाट। राष्ट्रीय राजमार्ग – 29, 23 कि.मी. पैदल 19 कि.मी

लखनेश्वर डीह

 

श्री राम यात्रा पथ खोज में निश्चित रूप से अधिक स्थानों के नाम राम जी अथवा सीताजी से संबंधित मिलते हैं । पर यथास्थान भैया लखन लाल की स्मृति से संबंधित तीर्थ भी प्राप्त हुए हैं । सिदागर घाट से आगे बढ़ने पर उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में लखनेश्वर डीह तीर्थ इसका प्रमाण है ।

लखनेश्वर असल में लक्ष्मणेश्वर का अपभ्रंश है तथा डीह का अर्थ है मिट्टी का पुराना टीला। लोक कथा के अनुसार सरयू जी के किनारे विश्वामित्र मुनि के साथ जाते समय लक्ष्मण जी ने यहाँ शिवलिंग की स्थापना की थी।

कुछ सौ वर्ष पूर्व निकट ही एक तालाब से एक शिवलिंग प्राप्त हुआ है। नगहर के दूबे राजा वह शिवलिंग ले जाना चाहते थे किन्तु शिवलिंग निकालने में असफल रहे तब उन्होंने वहीं मंदिर की स्थापना कर दी। वह मंदिर आज भी यहाँ श्रद्धा का केन्द्र है।

ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 1/22/11 से 24 तक। मानस 1/205 दोहे से 1/208/2 तक

आगे का मार्ग
लखनेश्वर डीह से रामघाटः- लखनेश्वर डीह-कुतुबपुर-कसीमाबाद-रासड़ा-
माधोपुर-सँवरा-पहाड़पुर – चिलकहर- डुमरी-कासीमाबाद रोड़, 42 कि.मी.। पैदल 39 कि.मी.

राम घाट नगहर

 

श्री राम की यात्रा में नदी तट पर अवस्थित तीर्थ बड़ी संख्या में हैं । ऐसा इसलिये कि प्राचीन काल में अधिकांश यात्रायें नदी तट के निकट से होकर ही आगे बढ़ती थीं । नदियों के किनारे किनारे चलने से स्थान की पहचान याद रखना आसान था तथा यात्रा क्रम में जल की प्रचुरता बनी रहती थी ।

नगहर में अवस्थित राम घाट लखनेश्वर डीह से आधा कि.मी. दूर पुरानी सरयू जी के किनारे है। लोक मान्यता है कि कभी गंगा और सरयू का संगम यहीं था । संगम में स्नान से पूर्व तीनों ने यहीं तट पर रात्रि विश्राम किया था।

वर्तमान काल में नदियों का मार्ग त्रेता युग से अब तक कई बार बदला है । गंगा और सरयू का संगम यहां नहीं अपितु अन्य स्थान पर है लेकिन यहां रामजी के मुनि विश्वामित्र के साथ आने की स्मृति आज तक बनी हुई है । यात्री आज भी यहां से सरयू जी पार करते हैं।

ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 1/22/11 से 24 तक। मानस 1/205 दोहे से 1/208/2 तक

आगे का मार्ग
रामघाट से कामेश्वरनाथः- जगदीशपुर -फरीदपुर -पिपरिया – रामगढ़ – अकोनी -कल्यानपुर-बड़गांव-खलीलपुर- रसूलपुर -धरमपुर-पुराचक कारांे। एस. एच-34/मऊ रोड़, 28 कि. मी.। पैदल 25 कि.मी

 

श्री राम जन्म भूमि अयोध्या

आप दर्शन कर रहे हैं टाट में विराजमान राम लला जन्मभूमि पावन तीर्थ के । अब यहां भव्य रामभूमि निर्माण की तैयारियां चल रही हैं । माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार अब यहाँ भव्य राम मंदिर का निर्माण होगा ।

हम सभी जानते हैं कि श्रीराम सहित चारों भाइयों की जन्म भूमि अयोध्या त्रेता युग में राजा दशरथ की राजधानी थी। यहीं से मुनि विश्वामित्र श्रीराम व लक्ष्मण जी को यज्ञ रक्षा के लिए अपने साथ लेकर चले थे।

बड़े हर्ष का विषय है कि राम लला की जन्मभूमि को लेकर चल रहा विवाद अब समाप्त हो गया है । भारतवर्ष के उच्चतम न्यायालय ने अनेक वर्षों तक चली सुनवाई के बाद अंततः इस स्थान को राम लला की जन्मभूमि के रूप में स्वीकार किये जाने का आदेश दिया । उचित समय पर मंदिर निर्माण के लिये भारत सरकार द्वारा एक न्यास का गठन होगा । इस न्यास के द्वारा नये मंदिर का निर्माण होगा ।

यहाँ दिखाया जा रहा चित्र १९९२ के बाद अस्थायी टेंट रूपी ढांचें में विराजमान राम लला का है । हम संकल्प लें कि भव्य मंदिर निर्माण के लिये हम तन मन धन से सहयोग करेंगे ।

ग्रंथों में उल्लेख
वाल्मीकि रामायण 1/5, 6, पूरे अध्याय तथा अन्य अनेक विवरण हैं। श्रीरामचरितमानस 1/15/1,1/34/2, 3, 1/189/1 से 1/207/4, 2/0/1 से 2/187/1 तक तथा अन्य अनेक विवरण है।

1 श्री राम जन्म भूमिः अयोध्याजी- यह यात्रा का प्रथम स्थल है। यहां जाने के लिए रेल तथा बस दोनों साधन हैं। वायुमार्ग से निकटतम हवाई अड्डा लखनऊ, इलाहाबाद है। लेकिन स्थलों की दृष्टि से अयोध्याजी को केन्द्र बनाकर प्रथम यात्रा के क्रम सं.1, सरयूजी तथा क्रम सं. 2 यज्ञ स्थल आते हैं। द्वितीय यात्रा के क्रम सं.1 अयोध्याजी, श्रीराम जन्मभूमि, क्रम सं. 2 मणिपर्वत, 234 भादर्शा, 235 राम कुण्ड, 236 हनुमान भरत मिलन मंदिर, 237 भरतकुण्ड़, 238 जटा कुण्ड, 239 दशरथ समाधि, 240 विभीषण कुण्ड, 241 शत्रुघ्न कुण्ड, 242 राम कुण्ड, 243 सुग्रीव कुण्ड, 244 हनुमान कुण्ड, 245 सीता कुण्ड, 248 जनकौरा तथा 249 गुप्तार घाट आते हैं। इसमें क्रम सं. 2 यज्ञ स्थल, बस्ती जिले में है तथा शेष सभी फैजाबाद जिले में हैं।

यात्रा क्रम की दृष्टि से यात्री को स्थानीय सूत्रों से सम्पर्क कर अपनी सुविधा से यात्रा क्रम निश्चित करना चाहिये। हमारे अनुसारः सर्वप्रथम-सरयूजी में स्नान-श्रीराम मंदिर निर्माण की कार्यशाला – अयोध्या शोध संस्थान-हनुमान गढ़ी-बड़ा स्थान-श्रीराम जन्मभूमि-कनक भवन तथा यथासाध्य अन्य मंदिरों के दर्शन करें। ये सभी तीर्थ अयोध्याजी नगर में आते हैं।

तत्पश्चात् क्रम सं. 2 मखौड़ा-239 दशरथ समाधि-236 हनुमान भरत मिलन मंदिर, 237 भरत कुण्ड, 238 जटाकुण्ड, 248 जनकौरा तथा 249 गुप्तार घाट के दर्शन करें। तत्पश्चात 235 रामकुण्ड, 245 सीताकुण्ड, 240 विभीषण कुण्ड, 241 शत्रुघ्न कुण्ड, 242 रामकुण्ड, 243 सुग्रीव कुण्ड, 244 हनुमान कुण्ड आदि के दर्शन करें। इस प्रकार अयोध्या जी के निकटवर्ती सभी तीर्थों के दर्शन हो सकते हैं।

मणि पर्वत अयोध्या फैजाबाद उत्तर प्रदेश

 

भगवान राम और माता जानकी के विवाह अवसर पर मिथिला नरेश जनक जी ने दहेज के रूप में बहुत बड़ा खजाना तथा रत्न व मणियाँ दान में दी थी। विवाहोपरांत बाराती के साथ मिथिला से चले भारवाहक दहेज का सामान लेकर अयोध्याजी पहुँचे । उन्होंने जिस स्थान पर रत्न और मणियों को रखा वहां पर्वत के समान ढेर लग गया था।

आज भी इसे मणि पर्वत कहते हैं। यहां श्री सीताराम जी सावन में झूला झूलने आते थे। आज भी हरियाली तीज को झूला की परम्परा है।

ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 1/74/3 से 7 तक मानस 1/325-1 से 4 तक

तमसा तट गौरा घाट फैजाबाद उप्र

 

ये है अयोध्याजी से कुछ दूरी पर तमसा नदी के तट पर अवस्थित गौरा घाट । यहाँ श्रीराम जी ने वनवास की प्रथम रात्रि विश्राम किया था। तमसा का वर्तमान नाम मंडाह एवं मढ़ार है । ये स्थल गौरा घाट के नाम से प्रसिद्ध है। गौरा शब्द गौरव का अपभ्रंश है। यह स्थान अयोध्याजी से लगभग 20 कि.मी. है।

ग्र्ंथ उल्लेख
वा.रा. 2/46/1से 17 तक तथा 28, मानस 2/84 दोहा से 2/84/1,2,3 तथा 2/85 दोहा।

आगे का मार्ग
तमसा तट से पुरवा चकियाः- तमसा तट से करीब 2 कि.मी. दक्षिण पूर्व में पुरवा चकिया नामक गांव में है।

श्री राम मंदिर पुरवा चकिया फैजाबाद उत्तर प्रदेश

 

पुरवा चकिया तीर्थ उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में तमसा नदी के तट से कुछ दूर गौराघाट के पास अवस्थित है । अयोध्याजी के नागरिकों को वनवास के कष्टों से बचाने के लिए श्रीराम जी उन्हें तमसा तट पर सोते छोड़ गये तथा यहाँ से रथ इस तरह घुमाया कि नागरिक रथ की लीक के पीछे-पीछे न आ सकें।

ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 2/46/18/ से 34, मानस 2/84/4 से 2/85 दोहा ।

आगे का मार्ग
पुरवा चकिया से श्रीराम मंदिरः- पुरवा चकिया -टाह डीह 4 कि.मी. पैदल 3 कि.मी.।

श्री राम मंदिर टाहडीह फैजाबाद उत्तर प्रदेश

 

ये है उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में अयोध्याजी के निकट टाहडीह में अवस्थित श्री राम मंदिर । टाहडीह की उत्पति ‘डाह’ शब्द से हुई है। अवधी में डाह का अर्थ है एकत्रित होकर रूदन करना। लोक मान्यता के अनुसार श्रीराम जी को न ढँूढ़ पाने के बाद अयोध्यावासियों ने यहाँ इकट्ठा होकर डाह किया था। अब यहाँ सीता राम जी एवं लक्षमण जी का मंदिर बना हुआ है। आप भी दर्शन कीजिये ।

अपने मन में अनुभूति लाइये कि जिस तरह अपने निज परिवार का कोई हमारे न चाहने पर भी बिछुड़ जाता है तो ठीक वही अनुभूति अयोध्यावासियों को उस पल हुई । जब जीवन में कभी ऐसी घड़ी आये जब कोई बिछुड़ रहा हो तो इस स्थान का दर्शन कीजिये और रामजी से प्रार्थना कीजिये कि हे प्रभु जैसे आप वापस लौट कर आये वैसे ही हमारा प्रिय भी पुनः शीघ्र लौट कर हमारे पास आये ।

जब कभी वियोग में मन अधीर हो तो इस तीर्थ का सुमिरन कीजिये भगवान आपको धैर्य से परिस्थिति का सामना करने का बल देंगे ।

ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 2/47/1 से 13, मानस 2/85/1 से 2/86 दोहा।

आगे का मार्ग
टाहडीह से सूर्य कुण्ड, रामपुरभगनः-
टाहडीह-दोसपुर-भादर्शा-सराय सुरा- बीकापुर-रामपुर भगन 15 कि.मी.

सूर्य कुंड फैजाबाद उत्तर प्रदेश

 

टाह डीह तीर्थ से आगे चलकर हम रामपुर भगन से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित सूर्यकुण्ड के दर्शन के लिये पहुँचते हैं । त्रेता युग में श्रीराम, लक्षमण तथा सीताजी ने यहां स्नान कर भगवान सूर्य की पूजा की थी। आइये हम भी भगवान सूर्य का भावरूपी पूजन इस पल करें ।

ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 2/46/21 से 34, मानस 2/84/4 परिस्थिति जन्य।

आगे का मार्ग
सूर्य कुण्ड से वेदश्रुति नदी :- रामपुरभगन-बीकापुर-चाँदपुर-सरायसुरा -वासुदेवपुर-सोंखरी-अमौनी-रसवाड़ा – तारून बाजार – करनपुर। राष्ट्रीय राजमार्ग से 28 कि.मी. और अम्बेडकर रोड़ से 23 कि.मी।
टिप्पणीः समय तथा व्यय बचाने के लिए यात्री वेदश्रुति नदी के बाद 247 मकरी कुण्ड तथा 246 धो-पाप कुण्ड आयें तथा वहां से गोमती नदी सुल्तानपुर

गविर्जा देवी मंदिर फैजाबाद उत्तर प्रदेश

 

वाल्मीकि रामायण में तमसा नदी से आगे चलने पर भगवान राम द्वारा अनेक नदियों के पार करने का विवरण मिलता है । इनमें वेदश्रुति नदी भी सम्मिलित है । वेदश्रुति नदी का वर्तमान नाम विसूही है । नदी पार करने के बाद माता जानकी ने जिस स्थान पर माता गिरिजा की विशेष पूजा अर्चना की उसकी याद लोक मानस में बनी रही । गिरिजा का नाम बदल कर गविरजा या फिर कवर्जा चलन में बना रहा । आप भी दर्शन करें ।

श्री राम ने वेदश्रुति नदी यहीं से पार की थी यह स्थान वेदरा तथा भैरवपुर टिकरा के पास है। लगभग 25 कि.मी. पड़ता है।

ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 2/49/10

आगे का मार्ग
वेदश्रुती नदी से धोपाप :- माया नन्सा रोड – जाना बाजार – मनुपरु पुरवापट्टी – धमहर – गोहानी कला – कुरेभर – करौदीपुर – बाबूंगज -बसौधी-रतनपुर-कस्बा सुलतानपुर- गोमती नदी। 40 कि.मी. मात्र पैदल 35 कि.मी.

सीता कुंड सुलतान पुर उत्तर प्रदेश

 

यहाँ गोमती नदी के किनारे महर्षि वालमीकि का आश्रम है। श्रीराम ने यहां से गोमती नदी पार की थी। सूल्तानपुर का पूर्व नाम श्रीराम जी के पुत्र कुश के नाम पर कभी कुशभानपुर बताया जाता है

ग्रंथ उल्लेखवा.रा.2/49/11, मानस 2/187 4, 2 321/3

आगे का मार्ग
गोमती नदी से वद्रथीः- सुल्तानपुर-हुसैनगंज-खोखीपुर- मनियारी-कस्थुनी पूरव-मुसाफिरखाना- कंजास-सालपुर-जगदीशपुर-सरेसर -कामापुर-मोहनगंज। राष्ट्रीय राजमार्ग 56 से 70 कि.मी.। पैदल 62कि.मी.

वद्रथी/बरूथी प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश

 

मोहनगंज नदी का वर्तमान नाम सकरनी नदी है। यह प्रतापगढ़ से पूर्व दिशा में लगभग 8 कि.मी. दूर है।

ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 6/125/26

आगे का मार्ग
वद्रथी से स्यंदिकाः-वद्रथी नदी से यात्री देवघाट, मोहन गंज, स्यंदिका नदी, देवघाट पर आयें।

देवघाट प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश

 

देवघाट प्रतापगढ़ स्यंदिका का वर्तमान नाम सई है। जहाँ से श्रीराम ने नदी पार की वह स्थान प्रतापगढ़ से 12 कि.मी. दूर देव घाट के नाम से प्रसिद्ध है।

ग्रंथ उल्लेख
वा.रा. 2/49/12, मानस 2/188/1 2/321/3

आगे का मार्ग
स्यंदिका नदी से बालुकिनी नदीः- मोहनगंज-भुवलपुर-पन्डासी-अमरौना – सराय अनादेव – नौबस्ता- करमचन्द्रपुर-जेठवारा- भिटारा-बहादुर पुरी-तोड़ी का पूरा- बेधन गोपालपुर। एम. डी. रोड़-42 कि.मी.।

अन्य उल्लेख

14 वर्ष के वनवास में श्रीराम प्रमुख रूप से 17 जगह रुके, देखिए यात्रा का नक्शा…

 

प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, तपस्या की और भारत के आदिवासी, वनवासी और तमाम तरह के भारतीय समाज को संगठित कर उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाया। संपूर्ण भारत को उन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछ ऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया।
रामायण में उल्लेखित और अनेक अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार जब भगवान राम को वनवास हुआ तब उन्होंने अपनी यात्रा अयोध्या से प्रारंभ करते हुए रामेश्वरम और उसके बाद श्रीलंका में समाप्त की। इस दौरान उनके साथ जहां भी जो घटा उनमें से 200 से अधिक घटना स्थलों की पहचान की गई है।
जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। आओ जानते हैं कुछ प्रमुख स्थानों के नाम..
1.तमसा नदी : अयोध्या से 20 किमी दूर है तमसा नदी। यहां पर उन्होंने नाव से नदी पार की।
2.श्रृंगवेरपुर तीर्थ : प्रयागराज से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था। श्रृंगवेरपुर को वर्तमान में सिंगरौर कहा जाता है।
3.कुरई गांव : सिंगरौर में गंगा पार कर श्रीराम कुरई में रुके थे।
4.प्रयाग : कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है।
5.चित्रकूणट : प्रभु श्रीराम ने प्रयाग संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।
6.सतना : चित्रकूट के पास ही सतना (मध्यप्रदेश) स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। हालांकि अनुसूइया पति महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे, लेकिन सतना में ‘रामवन’ नामक स्थान पर भी श्रीराम रुके थे, जहां ऋषि अत्रि का एक ओर आश्रम था।
7.दंडकारण्य: चित्रकूट से निकलकर श्रीराम घने वन में पहुंच गए। असल में यहीं था उनका वनवास। इस वन को उस
काल में दंडकारण्य कहा जाता था। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों को मिलाकर दंडकाराण्य था। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के अधिकतर हिस्से शामिल हैं। दरअसल, उड़ीसा की महानदी के इस पास से गोदावरी तक दंडकारण्य का क्षेत्र फैला हुआ था। इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।
8.पंचवटी नासिक : दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। यह आश्रम नासिक के पंचवटी क्षे‍त्र में है जो गोदावरी नदी के किनारे बसा है। यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथ युद्ध किया था। गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है।
9.सर्वतीर्थ : नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया था जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है। जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में मौजूद है। इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया था। इसी तीर्थ पर लक्ष्मण रेखा थी।
10.पर्णशाला: पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटे की दूरी पर स्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भी कहते हैं। पर्णशाला गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां से सीताजी का हरण हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपना विमान उतारा था। इस स्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी ने धरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है। यहां पर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है।
11.तुंगभद्रा : सर्वतीर्थ और पर्णशाला के बाद श्रीराम-लक्ष्मण सीता की खोज में तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए।
12.शबरी का आश्रम : तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है। शबरी जाति से भीलनी थीं और उनका नाम था श्रमणा। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है। केरल का प्रसिद्ध ‘सबरिमलय मंदिर’ तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है।
13.ऋष्यमूक पर्वत : मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया। ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है। पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था जो हनुमानजी के गुरु थे।
14.कोडीकरई : हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने वानर सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है। यहां श्रीराम की सेना ने पड़ाव डाला और श्रीराम ने अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित कर विचार विमर्ष किया। लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया।
15..रामेश्‍वरम : रामेश्‍वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्‍वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। महाकाव्‍य रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग है।
16.धनुषकोडी : वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया। धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है।
इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है।
17.’नुवारा एलिया’ पर्वत श्रृंखला : वाल्मीकिय-रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।
श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानों की भौगोलिक विशेषताएं, जीव, वनस्पति तथा स्मारक आदि बिलकुल वैसे ही हैं जैसे कि रामायण में वर्णित किए गए हैं।
श्रीवाल्मीकि ने रामायण की संरचना श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद वर्ष 5075 ईपू के आसपास की होगी (1/4/1 -2)। श्रुति स्मृति की प्रथा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिचलित रहने के बाद वर्ष 1000 ईपू के आसपास इसको लिखित रूप दिया गया होगा। इस निष्कर्ष के बहुत से प्रमाण मिलते हैं। रामायण की कहानी के संदर्भ निम्नलिखित रूप में उपलब्ध हैं-
* कौटिल्य का अर्थशास्त्र (चौथी शताब्दी ईपू)
* बौ‍द्ध साहित्य में दशरथ जातक (तीसरी शताब्दी ईपू)
* कौशाम्बी में खुदाई में मिलीं टेराकोटा (पक्की मिट्‍टी) की मूर्तियां (दूसरी शताब्दी ईपू)
* नागार्जुनकोंडा (आंध्रप्रदेश) में खुदाई में मिले स्टोन पैनल (तीसरी शताब्दी)
* नचार खेड़ा (हरियाणा) में मिले टेराकोटा पैनल (चौथी शताब्दी)
* श्रीलंका के प्रसिद्ध कवि कुमार दास की काव्य रचना ‘जानकी हरण’ (सातवीं शताब्दी)
संदर्भ ग्रंथ :
1. वाल्मीकि रामायण
2. वैदिक युग एवं रामायण काल की ऐतिहासिकता (सरोज बाला, अशोक भटनागर, कुलभूषण मिश्र)

 

अजय राम मऊ संवाददाता

वाट्सएप संदेश पर आधारित लेख

भारत की संस्कृति राममय है। हर सच्चे भारतीय के दिल में बसते हैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और उनके जीवन आदर्श। हमारे देश में ऐसे अनेक प्राचीन स्थल हैं जो श्रीराम के जीवन से निकटता से जुड़े हैं। यंी तो श्रीराम की जन्मभूमि के रूप में उत्तर प्रदेश में पावन सरयू के तट पर बसी अयोध्या नगरी विश्वविख्यात है। मगर क्या आप इस दिलचस्प तथ्य से अवगत हैं कि दक्षिण भारतीय राज्य आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले की एक छोटी सी खूबसूरत तीर्थनगरी भद्राचलम को दक्षिण की अयोध्या की मान्यता हासिल है। श्री राम के वनवास काल से अभिन्न रूप से जुड़ा यह पुण्य क्षेत्र अगणित रामभक्तों का श्रद्धा का केन्द्र है।

गौरतलब हो कि यह स्थल दंडकारण्य के नाम से भी विख्यात है। वही त्रेतायुगीन दंडक वन जहां श्रीराम ने जहां राम ने पर्णकुटी बनाकर वनवास का लंबा समय व्यतीत किया था और अनेकानेक आसुरी शक्तियों का संहार कर ऋषि मुनियों को उनके आतंक से निजात दिलायी थी। भद्राचलम में वह पर्णशाला आज भी मौजूद है। यही नहीं यहां उन कुछ ऐसे शिलाखंडों के चिह्न आज भी देखे जा सकते हैं; जिनके बारे में यह माना जाता है कि सीता जी ने वनवास के दौरान वहां अपने वस्त्र सुखाए थे। इस तीर्थ से जुड़ी एक अन्य पौराणिक मान्यता यह भी है कि लंकापति रावण ने यहीं से सीता माता का अपहरण किया था।

भद्राचलम यानी दंडकारण्य की एक विशेषता यह भी है कि यह वनवासी बहुल क्षेत्र है और श्रीराम वनवासियों के आराध्य माने जाते हैं। कहा जाता है कि इसी क्षेत्र में श्रीराम ने भीलनी के जूठे बेर खाये थे और उन्हें अपनी जननी कौशल्या के समान ही प्रेम व सम्मान दिया था। चूंकि वह वृद्ध भीलनी आदिवासी समाज की थी, इसी कारण श्री राम वनवासियों खासतौर पर आदिवासियों के पूज्य बन गये। सनद रहे कि वनवासी बहुल क्षेत्र होने के कारण ईसाई मिशनरियां यहां लम्बे अरसे से मतांतरण की कोशिश में जुटी हैं पर भद्राचलम की महिमा कुछ ऐसी है कि लाख प्रयासों के बाद भी यहां मतांतरण के षड्यंत्र सफल नहीं हो सके।
गोदावरी नदी के तट पर बसा भद्राचलम नगर अपने भव्य सीतारामचंद्र मंदिर के लिए देश- विदेश तक मशहूर है। हर साल रामनवमी के दिन यहां भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव भारी धूमधाम से मनाया जाता है। दशहरा का त्योहार भी इस मंदिर में खूब धूमधाम से मनाया जाता है। इसके अलावा चैत्र व आश्विन नवरात्रि में भी यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। रामनवमी और यहां चलने वाले दस दिवसीय महोत्सव में हिस्सा लेने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में भक्त यहां आते हैं। इस सीतारामचंद्र मंदिर के निर्माण के पीछे एक रोचक जनश्रुति जुड़ी है। कहा जाता है कि आंध्र प्रांत के खम्मम जिले के भद्रिरेड्डीपालेम ग्राम में पोकला दमक्का नाम की एक रामभक्त वनवासी महिला रहती थी। कहते हैं कि किसी हादसे में उसका समूचा परिवार समाप्त हो गया तो वह रामभक्ति में लीन हो गयी। उसने एक अनाथ बच्चे को गोद ले लिया और उसके भरण पोषण में अपना जीवन बिताने लगी। कहा जाता है कि उसी वनवासी वृद्धा ने भद्राचलम में भगवान श्रीराम की पर्णकुटी बनवायी थी।

भद्रगिरि की अनोखी पर्णकुटीर

वनवासी दमक्का द्वारा यहां बनवायी गयी पर्णकुटीर से एक बेहद रोएक वाकया जुड़ा है। कहते हैं कि एक दिन दमक्का का वह दत्तक पुत्र राम जिसका नाम उसने अपने आराध्य के साम पर राम रखा था; खेलते-खेलते वन में चला गया। देर शाम तक जब वह वापस नहीं लौटा तो दमक्का को कुछ चिंता हुई और वह राम-राम पुकारते हुए अपने पुत्र को खोजते-खोजते घने जंगल में जा पहुंची। तभी अचानक एक दिशा से आवाज आयी – मां, मैं यहां हूं। पुन: नाम पुकारते हुए दमक्का आवाज की दिशा में आगे बढ़ी तो कुछ कदम चलने पर उसने महसूस किया कि वह आवाज एक गुफा के अंदर से आ रही है। आवाज सुनकर दम्मक्का गुफा के भीतर गयी। वहां पर उसे श्रीराम, सीता और लक्ष्मण की अत्यन्त सुंदर प्रतिमाएं दिखीं। एक निर्जन वन में गुफा के बीच अपने इष्ट आराध्य की ऐसी मनमोहक प्रतिमाएं देख दम्मक्का भावविभोर हो उठी। उसने भक्तिभाव से नतमस्तक होकर उन प्रतिमाओं को नमन किया। तभी उसने अपने पुत्र को भी वहीं निकट ही खड़ा पाया। दमक्का को यह घटना एक वरदान प्रतीत हुई। उससे महसूस किया कि वे प्रतिमाएं उसे एक दैवीय संदेश दे रही हैं। उस मूक संदेश को मन मस्तिष्क में ग्रहण कर दमक्का ने उस गुफा के निकट बांस की एक पर्णकुटी को बनाकर तथा उसे एक अस्थाई मंदिर का रूप देकर उसमें वे देव प्रतिमाएं स्थापित कर दी। देखते ही देखते वहां दर्शन को आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया और कालान्तर में समूचे क्षेत्र में विख्यात हो गया।

भद्राचलम के तहसीलदार ने बनवाया था भव्य सीतारामचंद्र मंदिर

यह उस समय का प्रसंग है जब हैदराबाद के निकट का यह क्षेत्र गोलकुंडा के नाम से जाना जाता था। यहां तानाशाह कुतुबशाही नवाब अबुल हसन का शासन था। वह नाजायज कर लगाकर गरीब जनता का शोषण किया करता था। उस समय कर वसूली के लिए कंचली गोपन्ना नामक एक वनवासी युवा बतौर तहसीलदार भद्राचलम में तैनात थे। गोपन्ना वनवासी समाज के थे और उनकी श्रीराम में अटूट आस्था थी। श्रीराम की कृपा से कर वसूली में उन्हें स्थानीय जनता से भरपूर सहयोग मिला। उन्होंने शासन से नियत कर राशि राजकोष में जमा करने के बाद शेष बचे धन से सर्वप्रथम भद्रगिरि की उस पर्णकुटी के चारों ओर एक विशाल परकोटा बनवाया और बाद में उसके भीतर एक भव्य राम मंदिर बनवाया जो रामभक्तों व सनातनधर्मियों की आस्था के अपूर्व केन्द्र के रूप में न केवल दक्षिण भारत वरन समूचे देश व विदेश में विख्यात है। रामभक्त गोपन्ना ने अपने निजी धन से कटिबंध, कंठमाला और मुकुट मणि आदि आभूषण बनवाकर श्रीराम, सीता व लक्ष्मण जी की उन मूर्तियों को अर्पित किये थे।

कांचली गोपन्ना आध्यात्मिक पुरुष थे। उन्होंने भद्राचलम क्षेत्र को धार्मिक जागरण का महत्त्वपूर्ण केन्द्र बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने श्रीराम जी की भक्ति में कई भजन भी लिखे थे इस कारण लोग उन्हें भक्त रामदास कहने लगे। हरिदास नामक घुमंतु प्रजाति आज भी इस क्षेत्र भक्त रामदास के कीर्तन गाते हुए राम भक्ति का प्रचार करती देखी जा सकती है। कहते हैं कि रामदास ने अपने भक्ति गीतों के माध्यम से विदेशी अक्रमणकारियों और तानाशाही राज के खिलाफ जनांदोलन चलाया था। संत कबीर उनके आध्यात्मिक गुरु थे और उन्होंने ही वनवासी गोपन्ना को रामानंदी संप्रदाय की दीक्षा देकर उन्हें रामदास नाम दिया था। रामदास के कीर्तन गांव-गांव, घर-घर में बेहद लोकप्रिय थे; मगर रामदास का यह धर्म जागरण कार्य तानाशाह को नहीं भाया और उन्होंने रामदास को गोलकोंडा किले में कैद कर दिया। कहा जाता है कि रामदास को कैद करने पर श्रीराम व लक्ष्मण धनलोलुप नवाब के सामने साधारण वेष में प्रकट हुए और रामदास की मुक्ति के बदले उसे सोने की मुद्राएं देने का प्रस्ताव उसके सामने रखा। नवाब ने स्वर्ण मुद्राएं पाकर रामदास को ससम्मान कैद से मुक्त कर दिया। आज भी हैदराबाद स्थित इस किले में वह काल कोठरी देखने को मिलती है जहां भक्त रामदास को कैदी की तरह रखा गया था।

किंवदंती है कि यह श्रीराम की शक्ति का ही चमत्कार था कि उनके हाथों से स्वर्ण मुद्राएं पाकर उस लालची नवाब का मन पूरी तरह बदल गया और उस घटना के बाद से वह नवाब भी गोपन्ना द्वारा बनवाये गये उस मंदिर में प्रति वर्ष रामनवमी तथा सीताराम विवाहोत्सव (कल्याणम्) के अवसर पर सीता-राम की प्रतिमाओं को मोती व नये वस्त्र भेंट करने लगा। यह प्रथा पिछले 400 वर्षों से निर्बाध जारी है। आज भी राज्य सरकार की ओर से मुख्यमंत्री मोती भेंट करते हैं। आज यह मंदिर हिन्दू-मुस्लिम सौहाद्र्र का प्रतीक माना जाता है।
कहते हैं कि लंकापति जब सीता माता का अपहरण कर रावण पुष्पक विमान से लंका जा रहा था तो यहीं पर जटायु ने रावण से लोहा लिया था। युद्ध में जटायु बुरी तरह जख्मी हो गये लेकिन उन्होंने तब तक शरीर नहीं छोड़ा जब तक राम को सीताजी के बारे में नहीं बता दिया। राम ने यहीं गोदावरी घाट पर अपने हाथों से जटायु का अंतिम संस्कार किया था। यहीं जटायु का एकमात्र मंदिर है। स्थानीय लोग भक्तिभाव से यहां पूजा करने आते हैं। इस जगह को स्थानीय भाषा में जटायुपाका यानी जटायु की टांग कहा जाता है।

प्राकृतिक आपदाओं से अप्रभावित रहने का वरदान
भद्राचलम के इस मंदिर के बारे में बहुत सी मान्यताएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि भगवान श्रीराम ने भद्रगिरि पर्वत पर पसरे प्राकृतिक सौंदर्य पर मुग्ध होकर वरदान दिया था कि दुनिया में कितनी भी बड़ी प्राकृतिक आपदा क्यों ना आ जाए, यह पर्वत उससे अछूता ही रहेगा। यही वजह है कि कई बार बाढ़ आने के बावजूद भद्राचलम पर्वत पर कभी कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा। यह भी कहा जाता है कि भद्र ऋषि ने इसी जगह पर श्री राम की आराधना की थी और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उनको अपने दर्शन दिए थे। तभी से ये पर्वत भद्राचलम कहलाने लगा।

अगर आप राष्ट्रवादियों की बहस देख रहे हैं तो एक बार रामेश्वरम याद कीजिये | प्रभु रामेश्वरम् के ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्री राम ने रामसेतु बनाने से पहले की थी | जब महावीर हनुमान ने उनके द्वारा दिए गए शिव लिंग के इस नाम का मतलब पूछा तो भगवान् राम ने शिव जी के नवीन स्थापित ज्योतिर्लिंग के स्वयं द्वारा दिए इस नाम की व्याख्या में कहा-
रामस्य ईश्वर: स: रामेश्वर: ||
मतलब जो श्री राम के ईश्वर हैं वही रामेश्वर हैं |

बाद में जब रामसेतु बनने की कहानी भगवान् शिव, माता सती को सुनाने लगे तो बोले के प्रभु श्री राम ने बड़ी चतुराई से रामेश्वरम नाम की व्याख्या ही बदल दी | माता सती ने पुछा, ऐसा कैसे ? तो देवाधिदेव महादेव ने रामेश्वरम नाम की व्याख्या करते हुए उच्चारण में थोड़ा सा फ़र्क बताया-
राम ईश्वरो यस्य सः रामेश्वरः ||
यानि श्री राम जिसके ईश्वर हैं वही रामेश्वर हैं |

अगर आप अब्राहमीक रिलिजन के चश्मे से देखेंगे तो ये कहानी जरा अजीब सी लग सकती है | इसे एक भारतीय की नजर से देखिये | आप अगर आस पास के किसी भगवान राम के मंदिर में जाकर बैठें और अपने मोबाइल फोन में वहां शिव तांडव का ऑडियो बजा दें तो क्या होगा ? क्या कोई टोकेगा कि राम के मंदिर में शिव की महिमा क्यों बजा रहे हो ? नहीं, उल्टा हो सकता है दो चार और लोग सुनने के लिए, हाथ जोड़े, पांच मिनट रुक जाएँ |

अब्राहमिक रिलिजन के चश्मे से ये अजीब होता है, क्योंकि वहां एक इश्वर का भाव होता है | विदेशियों को ये अजीब लगेगी, लेकिन भगवान राम को पूज्य मानने के साथ साथ शिव की महिमा सुनना, वो भी उस शिव तांडव में जो कि राम के शत्रु रावण की रचना है, बिलकुल नार्मल बात है | हमारे लिए एक का समर्थक होने का मतलब दुसरे का विरोधी हो जाना नहीं होता है |

ये कहानी वर्चुअल वर्ल्ड यानि आभासी दुनिया की बहसों में भी याद रखिये | यहाँ अगर आप दो घनघोर किस्म के राईट विंग, अर्थात हिन्दुत्ववादी महानुभावों को किसी मुद्दे पर धुर विरोधी भी देखते हैं तो गलतफहमी बिलकुल मत पाल लीजिये | अलग अलग शहरों में बैठे ये लोग शायद रोज़ ही एक दुसरे से फ़ोन पर बात करते हैं | कमेंट में किसी मुद्दे पर बात के साथ इनबॉक्स में कोई और चर्चा चल रही होगी | राम-रावण जैसे विपरीत धुरी पर दिखते हुए भी ये शिव के मुद्दे पर फिर एक होंगे |

बाकी थोड़ी छेड़-छाड़ से अब्राहमिक, बदल कर अब्रह्मिक, यानि ब्रम्ह के आभाव से ग्रस्त हो जाता है | अन्दर के तत्व को अनदेखा करके. बाहर के खोल पर ध्यान मत टिकाइए |

राजा राम की यात्राओं से संबंधित तीर्थों के बारे में संप्रति शोध कार्य चल रहा है । श्री राम वनगमन यात्रा स्थलों में से कुछ तीर्थों के संबंध में मान्यता है कि रामजी अयोध्या में राज्यारोहण के पश्चात यहां पुनः तीर्थ दर्शन के क्रम में यहाँ आये । ऐसे कुछ तीर्थों के बारे में यथास्थान जानकारी दे दी गयी है ।

जैसे ही राजा राम से संबंधित तीर्थों पर हमारा शोधकार्य पूर्ण हो जायेगा वैसे ही संबंधित विवरण इस खंड में उपलब्ध करा दिये जायेंगे ।