दिव्य देश (108)

श्रीसम्प्रदाय के / रामानुज संप्रदाय के १०८ दिव्या देश

।।श्रीमते शठकोपाय नमः, श्रीमते रामानुजाय नमः, श्रीमद वरवरमुनये नमः , श्री वानाचल महामुनये नमः, श्री श्रीनिवास सद्गुरुवे नमः , श्री नागोरिया पीठाधिपति का मंगल हो :।।

दिव्य देश याने भगवान श्रीमन्नारायण के या उनके अवतारों के मंदिर जहाँ आळ्वार संतो ने भगवान के दर्शन कर उनका मंगलाशासान किया |

सारे ही दिव्य देशों में भगवान श्रीमन्नारायण ऋषि मुनियों , तपस्वियों और भागवतों पर अनुग्रह कर प्रकट हुये , और उनके आग्रह पर उसी स्वरुप में , भविष्य में भागवतों के कल्याणार्थ , उनका उद्धार करने , उन्हें मोक्ष , परमपद प्राप्त करवाने , इस धरा पर जहाँ प्रकट हुये वहीँ पर विराज गये |

दिव्य देश  मुख्यतः द्रविड़ देश याने तमिलनाडु में ही ज्यादा है | हमारे श्री संप्रदाय के आळ्वार संत और सारे पूर्वाचार्यों का आविर्भाव , भगवत रामानुज स्वामीजी का आविर्भाव द्रविड़ देश में ही हुआ ,इसी कारण दिव्य देश की द्रविड़ देश में ज्यादा है |

हमारे पूर्वाचार्यों ने भागवतों की सुविधार्थ इन दिव्य देशों को इनके तत्कालीन अवस्थित स्थानों को देखते हुये ,

७ भागों में बाँटा है  , जो इस प्रकार है:                  

१. चोळनाडु  (चोल राज्य में स्थित)               ४० दिव्य देश .

२. पांड्या नाडु (पाण्ड्य राज्य में स्थित)          १८ दिव्य देश

३. नाड नाडु                                                २ दिव्य देश

४. मलय नाडु  (केरल प्रान्त स्थित)                १३ दिव्य देश

५.तोंडाय नाडु                                          २२ दिव्य देश

६. वड़ नाडु (उत्तर भारत स्थित)                  ११ दिव्य देश

७. इस धरा से बहार                                  २ दिव्य देश

१०७. क्षीर सागर  और

१०८. श्रीवैकुण्ठ ( परमपद )

यह तो हमारे संप्रदाय कीभाषा में हुये. साधारण प्रचलित भाषा में यह दिव्य देश इन प्रान्तों में अवस्थित है:

१. तमिलनाडु में         ८२ दिव्य देश |

२.केरल प्रान्त में         १३ दिव्य देश |

३. आंध्र प्रदेश में          २ दिव्य देश |

४. उत्तर प्रदेश में         ४ दिव्य देश |

६. उत्तराँचल               ३ दिव्य देश |

५. गुजरात में              १ दिव्य देश |

६. नेपाल में                १ दिव्य देश |

७. इस धरा के बहार   २ दिव्य देश |

केरल और तमिलनाडु की सीमा पर स्थित होने के कारण कुछ विद्वान तमिलनाडु में ८४ और केरल में ११ दिव्य देश बतलाते है |

आळ्वार संतो के मंगलाशासान:

श्री सरयोगी आळ्वार संत ने,                                      ६ दिव्य देशों का मंगलाशासान किया |

श्री भूतनाथ आळ्वार संत ने                                     १३ दिव्य देशों का मंगलाशासान किया |

श्री महद्योगी आळ्वार संत ने                                    १५ दिव्य देशों का मंगलाशासान किया |

श्री भक्तिसार योगी आळ्वार संत ने                           १७ दिव्य देशों का मंगलाशासान किया |

श्री नम्माळ्वार आळ्वार संत ने                                 ३७ दिव्य देशों का मंगलाशासान किया |

श्री कुलशेखर आळ्वार संत ने                                     ९ दिव्य देशों का मंगलाशासान किया |

श्री पेरिया आळ्वार ( श्री विष्णूचित्त स्वामीजी) ने            १८ दिव्य देशों का मंगलाशासान किया |

पराम्बा माँ गोदाम्बाजी ने                                          ११ दिव्य देशों का मंगलाशासान किया |

श्री भक्तांघ्रिरेणु आळ्वार संत ने                                   १ दिव्य देशों का मंगलाशासान किया  |

श्री तिरुप्पन आळ्वार संत ने                                       १ दिव्य देशों का मंगलाशासान किया |

श्री परकाल स्वामीजी ने                                           ८४ दिव्य देशों का मंगलाशासान किया |

आसन स्वरुप :  

इन दिव्य देशों में भगवान श्रीमन्नारायण          २७ दिव्य देशों में शयन मुद्रा में दर्शन देते है |

२१ दिव्य देशों में भगवान बिराजे हुये दर्शन देते है |

और

६० दिव्य देशों में भगवान श्रीमन्नारायण खड़ी हुयी मुद्रा                                                                  में दर्शन देते है |

मुख दिशा:

भगवान      ७९ दिव्य देशों में पूर्वाभिमुखी हो दर्शन देते है |

भगवान      १९ दिव्य देशो में पश्चिमाभिमुखी हो दर्शन देते है |

भगवान        ३ दिव्य देशों में उत्तराभिमुखी हो दर्शन देते है |

भगवान       ७ दिव्य देशों में दक्षिणाभिमुखी हो दर्शन देते है |

संप्रदाय के १२ आळ्वार संतो में,  सिर्फ ११ आळ्वार संतो ने भगवान का मंगलाशासान किया है , श्री मधुर कवी आळ्वार ने भगवान का मंगलाशासान नहीं किया उन्होंने अपने आचार्य श्री नम्माळ्वार ( श्री शठकोप स्वामीजी) का ही मंगला शासन किया है |

११ आळ्वारों में २ आळ्वार संत श्री पेरिया आळ्वार (श्री विष्णूचित्त स्वामीजी)   और श्री तिरुमंगै आळ्वार ( परकाल स्वामीजी) ने उत्तर भारत के दिव्य देशों का मंगलाशासान किया है |

श्री नम्माळ्वार आळ्वार कहीं किसी दिव्य देश दर्शन / मंगलाशासन के लिए नहीं गये, सारे दिव्य देश के पेरुमाळ , आळ्वार संत के पास पधारे, उनके इमली के पेड़ पर श्री नम्माळ्वार आळ्वार संत से अपने मंगलाशासान सुनने आते थे |

जिस इमली के पेड़ के कटोर में  संत विराजे हुये थे , उसी पेड़ की शाखाओं पर पेरुमाळ बिराजकर शठकोप स्वामीजी से अपना मंगलाशासन करवाया था |

आळ्वार संतो के मंगलाशासान :

 मुदल आळ्वार :

श्री सरयोगी आळ्वार ने         १०० पाशुरों से,

श्री भूतनाथ आळ्वार             १०० पाशुरों से ,

श्री महद्योगी आळ्वार            १०० पाशुरों से ,

श्री भक्तिसार योगी आळ्वार   २१६ पाशुरों से ,

श्री नम्माळ्वार आळ्वार       १२९६ पाशुरों से ,

श्री मधुरकवि आळ्वार             ११ पाशुरों से ( शठकोप स्वमीजी के लिए, कन्नीनूनशीरुताम्बू ),

राजा श्री कुलशेखर आळ्वार   १०५ पाशुरों से ,

श्री पेरिया आळ्वार                ४७३ पाशुरों से , ( श्री विष्णूचित्त स्वामीजी)

पराम्बा माँ गोदाम्बाजी           १७३ पाशुरों से ,

श्री भक्तांघ्रिरेणु आळ्वार         ५५ पाशुरों से ,

श्री तिरुप्पन आळ्वार              १० पाशुरों से ,

श्री तिरुमंगै आळ्वार           १२५३ पाशुरों से ,

इनमे तिरुवेंकट अमुदनार स्वामीजी ( श्री रँगामृत स्वामीजी) द्वारा रचित रामानुज नत्रांतुडी की १०८ श्लोक मिलाकर ४००० दिव्य प्रबंध पाशुर ( द्रविड़ वेद) कहलाते है |

सभी  ११ आळ्वार संतो ने भगवान रंगनाथजी का (श्रीरंगम) का मंगलाशासान किया है |सिर्फ मधुरकवि आळ्वार संत ने नहीं किये.  उन्होंने ने सिर्फ अपने आचार्य का मंगलाशासान किया है, इस दिव्य धाम के लिये , सभी आळ्वारों द्वारा मंगलाशासित पाशुर की संख्या २४७ है |

रंगनाथजी के बाद तिरुवेंकट मुदियान श्री वेंकटेश बालाजी तिरु वेंगड़म का  मधुरकवि आळ्वार और तिरुप्पन आळ्वार को छोड़कर सभी ने २०२ प्रबंध पाशुरों से मंगलाशासन किया है |

चोळनाडु दिव्य देश , चोल राज्य में ४० दिव्य देश है:

यह क्षेत्र दक्षिण पेन्नार से कावेरी नदी के मध्य पड़ता है,  इस क्षेत्र के ४० दिव्य देशों में ८ दिव्य देशों में पेरुमाळ भगवान कृष्ण के स्वरुप में दर्शन देते है |

३ दिव्य देशों में भगवान रामजी के स्वरुप में दर्शन देते है, इन दिव्य देशों की एक और खासियत है , यहाँ  २१ दिव्य देशों में नाच्चियार (तायार) का नाम पुष्पों (फूलो ) के नाम पर है |

यह  ४० दिव्य देश श्रीरंगम, तंजावूर, कुंबकोणम , मायावरम , नागपट्टिनम , चिदंबरम और सिरकळली के आस पास है |

श्रीरंगम    ७  दिव्य देश :

१. श्रीरंगम,

२. तिरुकरमबानुर (उत्तमार कोइल) ,

३. तिरकोळी ( उरैयूर) ,

४. तिरु अंबिल,

५. तिरुप्पेरनगर ( कोविलाड़ी) ,

६. तिरुवेळ्ळराय और

७. तिरूक्कंडियूर  यह ७ दिव्य देश श्रीरंगम के आस पास है |

तंजावूर और कुंबकोणम :

८. तिरु तन्जाइ ,

९. तिरी वेल्लियांकुडी ,

१०. तिरु अधानूर,

११. तिरुकुडंतै  ,

१२.तिरुपल्लम भूतमकुड़ी ,

१३ तिरु कपिस्थलम ,

१४. तिरु नन्दीपुरा विन्नगराम ,

१५. तिरुक्कुदलूर,

१६.ओप्पीलियप्पन   कोइल,

१७.तिरुनराइयुर ( नाच्चियार कोइल) ,

१८. तिरुचेरराइ ,

१९. तिरुकन्नामंगाय ,

मायावरम :

२०. तिरुवळ्ळुन्दुर ,

२१. तिरु सिरुपपूलियर ,

२२. तिरुथलाइचांगा नांमदीयं  ,

२३ . तिरुइनधालुर  .

नागपट्टिनम :

२४. तिरु नागाई ,

२५. तिरुकन्नापुरम ,

२६. तिरुकन्नानगुड़ी

चिदाम्बरम:

२७. तिरु चित्रकूटं

सिरगळली :

२८. सीरकाली ,

२९. तिरुवल्ली और तिरुनगरि ,

३० तिरुकवाळम्पाडी ( तिरु नानगुर) ,

३१. तिरु अरिमय विन्नगराम ,

३२. तिरु वण्णपुरुषोत्तम,

३३. तिरु सेम्पोसि कोइल .

३४. तिरु मनिमड़ा कोइल,

३५. तिरु वैकुण्ठा विन्नगराम कोइल ,

३६. तिरु देवनात थोगै ,

३७. तिरु थेतरिअम्बलम ,

३८. तिरु मणिकूडम ,

३९ तिरुवळ्ळुकुलम और

४० तिरु पार्थान्पल्ली |

पाण्ड्यानाडु दिव्य देश :

इस क्षेत्र में १८ दिव्य देश है , यह क्षेत्र कावेरी के दक्षिण से, दक्षिण में समुद्र के किनारे तक है | आळ्वार तिरुनगरि के नव तिरुपति भी इसी पाण्ड्यानाडु दिव्य देश में आते है |

पंड्या राजवंश से शासित क्षेत्र है |

इस क्षेत्र के दिव्य देश यह है :

तिरुनेलवेल्ली :

१. तिरुकुरणगुड़ी ,

२. तिरुचिरिवरमांगै (वानमामलै , तोताद्री, नांगुनेरी),

३. तिरुवैकुंठम ( श्री वैकुण्ठ),

४. तिरुक्कुरुगुर ( आळ्वार तिरुनगरी),

५. तिरुक्कोलूर ,

६. तिरुप्पेरै,

७. तिरुक्कुलङ्घे ( पेरूनकुलम),

८. तिरुवरगुणमांगै,

९. तिरु पुल्लिनकुड़ी ,

१०. तिरुतोल्लै विल्लीमंगलम ,

क्रमांक २ से १० तक के दिव्य देश नवतिरुपति में आते है |

इन नवतिरुपति दिव्यदेश का मंगलाशासन नम्माळ्वार आळ्वार ने किया है |

इन नवतिरुपति में पेरुमाळ के साथ २ तायार भी विराजित है |

मदुरै :

११. तिरकूडल अल्गार कोयिल ,

१२. तिरुमालिनरुमशोलाइ,

१३. तिरु मोगुर,

विरुद्धनगर :

१४. श्रीविल्लिपुत्तूर,

१५. तिरुटंका ,

रामनाथपुरम :

१६. तिरुपुल्लानी |

पुडुकोट्टई :

१७. तिरुकोष्टियुर ( गोष्ठिपुरम) |

१८. तिरुमयम |

तोंड़ैनाडु दिव्य देश :

पल्लव राजवंश से शासित प्रदेश को तोंड़ैमंडलम या तोंड़ैनाडु प्रदेश कहते है , इस क्षेत्र के उत्तर में स्वर्णमुखी नदी और दक्षिण में पेन्नार नदी है |

इस  तोंड़ैनाडु प्रदेश में २२ दिव्य देश है |

कांचीपुरम पल्लव देश की राजधानी है |

इन २२ दिव्य देशों में १४ दिव्य देश कांचीपुरम में है | तिरुपातकुली दिव्य देश कांचीपुरम के बाहरी क्षेत्र में है |

कांचीपुरम :

१. तिरुक्काची ( हस्तिगिरि ) भगवान वरदराज |

२. तिरुवेक्का |

३. अष्टभुजा |

४. तिरु नीरगाम |

५. तिरु उर्गम |

६. तिरु कारगम |

७. तिरु कारवान्नं  |

८. परमेश्वर विन्नगराम |

९. तिरुपवालावण्णं  |

१०. तिरुपादगम |

११. तिरुनीलाथिंगल तुण्डं |

१२. तिरुक्कालवनूर |

१३. तिरुवेल्लुक्कै |

१४. तिरु टंका (तोपुल) |

१५. तिरुपुत्तकुली |

चेन्नई और महाबलीपुरम :

१६. तिरुवल्लुर |

१७. तिरुनीन्द्रावूर |

१८. तिरुवेल्लिकेनि |

१९. तिरुनीरमलाई |

२०. तिरुकुडंदै |

२१. तिरुकदलमलाई |

अरक्कोणम :

२२. तिरूक्कडिगै (शोलिंगुर) |

मलय नाडु दिव्य देश :

आर्यावर्त   के सुदूर   दक्षिण पश्चिम   का आधा   भाग  जो  चेरा  राजवंश से शासित रहा  उसे  मलय नाडु नाम  से जानते  है |

मलय नाडु दिव्य देश आत्मा परमात्मा के सम्बन्ध जैसे ही भक्त और भगवान के  सम्बन्ध, महाभारत और रामायण से सम्बन्ध  को दर्शाते है | मलयनाडु के सरे दिव्य देश के पेरुमाळ , भगवान राम , कृष और परशुरामजी के स्वरुप है |

मलयनाडु के दो दिव्य देश , तिरुअंनतपुरम (पद्मनाभ स्वामी) और तिरुवट्टार  (पद्मनाभ स्वामी), जिनके दर्शन ३ दरवाजों से करने पड़ते है, याने तिरु मुख एक दरवाजे से , पेरुमाळ के कंधे से घुटने तक के दर्शन एक दरवाजे से, और तिरुवेडी के दर्शन एक दरवाजे से |

इस तरह के दर्शन के लिये,  आचार्यों ने अपना मत यह भी दिया की , यह दर्शन मानव जीव का जीवन चक्र , याने के जन्म, परण और मृत्यु को दर्शाती है |

इस क्षेत्र के दिव्य देशों में पांच दिव्य देश

१. तिरुच्चेंकुंदरूर ( धर्मराज युद्धिष्ठिरजी) द्वारा सेवित ,

२. तिरुवारणविलै   ( अर्णामुला ) अर्जुन द्वारा सेवित   ,

३. तिरुप्पुलियूर ( भीम द्वारा सेवित)

४. तिरूवनवंदूर  ( नकुल द्वारा सेवित)

५. तिरुक्काड़ीथानाम ( सहदेव द्वारा सेवित)  .

पांडवों द्वारा बनवाये / आराधित है  |

इस क्षेत्र की एक और खासियत है की , यहाँ ६ दिव्य देश की तायार के नाम पुष्पों के नाम पर है |

१. तिरुवन्परिसाराम दिव्य देश की तायार का नाम  “कमलवल्ली  नाच्चियार ”,

२.तिरुच्चेंकुंदरूर दिव्य देश की तायार का नाम  “सेन्गलमलवल्ली  नाच्चियार” ,

३.तिरुविथुवाकोडु दिव्य देश की तायार का नाम “पद्मपाणि  नाच्चियार”

४.तिरुवारणविलै दिव्य देश की तायार का नाम “पद्मसानी  नाच्चियार”,

५.तिरुप्पुलियूर  दिव्य देश की तायार का नाम “पोरकोडी  नाच्चियार”

६. तिरुनाव्या   दिव्य देश की तायार का नाम ” मलार  मांगै नाच्चियार”

मलयनाडु दिव्य देश :

१. तिरुवनन्तपुरम ,

२. तिरुवन्परिसरम ,

३. तिरुप्पुलियूर,  (चेंगन्नूर)

४. तिरुच्चेंकुंदरूर , (चेंगन्नूर)

५. तिरुनाव्या    (तिरुनावै )

६. तिरुवारणविलै  (अरानमुला )

७. तिरूवनवंदूर  (चेंगन्नूर)

८. तिरुवलवल  (तिरुवल्ला )

९. तिरुक्काड़ीथानाम  (चंगनासेरी)

१०. तिरुक्कातकारै  ( एर्नाकुलम ,इडापल्ली के नज़दीक )

११. तिरुमूलिककालाम  (कोचीन  इंटरनेशनल  एयरपोर्ट  के नज़दीक )

१२. तिरुविथुवाक्काडु  (त्रिसूर , पट्टाम्बी  के नज़दीक )

१३ . तिरुवट्टारू

नाड नाडु दिव्य देश :

पल्लव और चोला राज्य के बीच का वह हिस्सा जो तत्कालीन समय किसी भी राज्य में उल्लेखित नहीं था  ,

इस क्षेत्र में २ ही दिव्य देश है

१. तिरुक्कोविलूर

तिरुक्कोविलूर , विल्लुपुरम के पास स्थित यह दिव्य देश , जहाँ त्रिविक्रम भगवान के दर्शन है } तीनों मुदल आळ्वार का मिलान भी इसी दिव्य देश में हुआ था |   गोदाम्बा नाच्चियार के तिरुप्पावै में , दिव्यदेश अनुभूति में सिंहासनाधीश अननङ्गराचार्य स्वामीजी को  भगवान वामन की ३ जगह अनुभूति होती है | यह दिव्य देश प्रथम वामन भगवान की अनुभूति का देश है |

२.तिरुवहिन्द्रपुराम . कुड्डलोरे के नज़दीक स्थित यह दिव्य देश

वड़नाडु दिव्य देश :

तोण्डैमण्डलम के उत्तरी भाग , याने उत्तर भारत को वड़नाडु कहा है

वड़नाडु  में ११ दिव्य देश है :

आँध्रप्रदेश :

१. तिरुवेंगड़म (तिरुमला तिरुपति)

२. सिन्गवेलकूंरम   (अहोबिल)

गुजरात :

१. द्वारकाजी

उत्तरप्रदेश

१. तिरु अयोध्या

२. तिरु नैमिषारण्य

३. वड मथुरा

४. तिरुवाईपपैडि

उत्तराखंड

१. बद्रीविशालजी

२. देवपरयाग

३. जोशी मठ / नन्द प्रयाग

नेपाल

१. मुक्तिनाथजी

दो दिव्य देश इस धरा के बहार है , जहाँ जीव सशरीर नहीं जा सकता

१.तिरुप्पारकाडल

२. परमपदम .

भगवत चरणारविन्दों में विश्वास , अनुराग रख जीवन यापन करने वाले बद्ध जीवों , इस लौकिक शरीर को छोड़ने के बाद , परमपद को प्राप्त करते है |

इन दोनों दिव्य देशों में से भगवान श्रीमन्नारायण , तिरुप्पारकाडल (क्षीर सागर)  में शेषशायी हो साथ में लक्ष्मीजी , गरुड़जी नित्य सुरियों के साथ विराजते है |

परमपद में भगवान श्रीमन्नारायण  बैठे हुये अपने पास आये हुये जीव को सायुज्य प्रदान करते हुये दर्शन देते है | श्रीसम्प्रदाय में वैष्णवों में मनाया जाने वाला वैकुण्ठोत्सव , जीव का सयुज्य प्राप्त करने का इस धरा पर उसके परिवार में परिकल्पना का मंचन है |

इन दोनों देशों में भगवान श्रीमन्नारायण दक्षिणाभी मुखी हो विराजते है |

कुछ दिव्य देशों में भगवान (पेरुमाळके शयनासन  दर्शन अष्ट विधा दर्शन कहलाते है जैसे ,

(१) वटपत्र शायी ( श्रीविल्लिपुत्तुर) |

(२) वीर शयनं (तिरुएवाल्लुर – तिरुवल्लुर के पास) |

(३) थल शयनं ( तिरुकदलमलै – महाबलीपुरम) |

(४) उत्थान शयनं ( तिरुकुदण्डाय – कुम्ब्कोणम – सारंगपाणी भगवान) |

(५) दरभा शयनं (तिरुपुल्लानी  – लंका चढ़ाई के पहले राम जी दर्भ पर विश्राम किये थे यह मंदिर         रामेश्वर से पहले पड़ता है) |

(६) भुजंगा शयनं ( रंगनाथजी श्रीरंगम)  |

(७) भोग शयनं ( तिरु चित्रकूटम- चिदंबरम) |

(८) मणिकका शयनं ( तिरुनीर्मलाई) |